वाराणसी [सौरभ चक्रवर्ती] : शारदीय नवरात्र के तहत तीन दिन के विशेष आयोजन के लिए पूजा संस्थाओं की ओर से लाखों रुपये खर्च कर दिए जाते हैं। भव्य पंडाल, सजावट व बिजली का खर्च जुटाना आसान नहीं है। पहले सिर्फ पूजा पर ही संस्थाएं जोर देती रही लेकिन बदलते दौर में अब भव्यता की होड़ लग गई है। इसके लिए अर्थ तंत्र मजबूत करना आयोजकों की मजबूरी हो गई है। सामान्य चंदे के दम पर बड़ा आयोजन संभव नहीं रहा। इसलिए आयोजकों ने कारपोरेट घरानों की ओर हाथ बढ़ाया।

तीन दिन की भीड़ को देखते हुए कारपोरेट जगत ने भी व्यवसायी हित का लाभ लेने में पीछे नहीं रहे। एक वक्त था जब चंद हजार रुपये में ही क्लबों की पूजा संपन्न हो जाती थी। अब खर्च बीस लाख रुपये से ऊपर जा चुका है। इतनी बड़ी रकम जुटाने के लिए आयोजकों ने स्थानीय कारोबारियों के साथ ही राष्ट्रीय स्तर की कंपनियों का दमन थामा है। इसमें बैंक, बीमा, मोबाइल व वाहन कंपनिया, ब्राडेड परिधान, खान-पान से संबंधित कंपनिया बैनर, पोस्टर, होर्डिंग, एलईडी बोर्ड, प्रोजेक्टर, स्वागत द्वार लगाकर पूजा को प्रायोजित करने लगी है। इससे आयोजकों की आर्थिक समस्या का निदान तो होता ही है साथ ही उस संस्थान की चर्चा भक्तों के बीच ज्यादा होने लगती है। जिस संगठन के पास बढ़ा बैनर होगा उसकी चर्चा ज्यादा होगी। कंपनिया भी सप्तमी, अष्टमी, नवमी को होने वाली लाखों की भीड़ का लाभ लेने के लिए आयोजकों को निराश नहीं करते। शहरी क्षेत्रों में होनी वाली पूजा आयोजनों में बीएचयू से लेकर शिवपुर तक के विभिन्न पूजा संगठन प्रायोजकों को खोजते हैं।

तीन दिवसीय आयोजन के लिए खर्च की कोई सीमा नहीं है। लोकोत्सव के तौर पर दुर्गा पूजा का क्रेज बढ़ता ही जा रहा है। सिर्फ चंदा जुटाकर पूजा करना संभव नहीं है। ऐसे में आर्थिक पक्ष को मजबूत बनाने के लिए बैंकों और अन्य कंपनियों को प्रायोजक बनाया जाता है। -अभिषेक चौधरी, सचिव, काशी दुर्गोत्सव समिति,

शिवाला पूजा आयोजन के सदस्यों के पास वक्त कम होने के कारण चंदे की कमी रहती है। साथी कंपनियों ने एक मुश्त रकम मिल जाने से सुविधा होती है। प्रायोजकों को भी बड़ी भीड़ का फायदा मिलता है और इसलिए कारपोरेट पूजा का चलन बढऩे लगा है। - देवाशीष दास, संरक्षक, वाराणसी दुर्गोत्सव सम्मिलनी, पाडेय हवेली