थाईलैंड की राजदूत ने वाराणसी में भारत-थाईलैंड सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंध बढ़ाने पर बल दिया
थाईलैंड की राजदूत ने वाराणसी में भारत के साथ हस्तशिल्प, व्यंजन और संस्कृति के माध्यम से संबंधों को मजबूत करने ...और पढ़ें

हस्तशिल्प, व्यंजन और संस्कृति के माध्यम से दोनों देशों के बीच व्यापार के नए आयाम होंगे स्थापित।
HighLights
थाईलैंड की राजदूत ने वाराणसी में संबंध मजबूत करने पर जोर दिया।
हस्तशिल्प, व्यंजन और संस्कृति से व्यापार के नए आयाम खुलेंगे।
बौद्ध धर्म और पर्यटन से जन-जन के संबंध प्रगाढ़ होंगे।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। थाईलैंड की भारत में राजदूत चवनार्ट थंगसुम्फांत ने कहा कि हस्तशिल्प, व्यंजन और संस्कृति को साथ लेकर नए आयाम स्थापित कर सकते हैं। थाईलैंड और भारत के बीच व्यापार के साथ-साथ बौद्ध धर्म का बहुत पुराना और गहरा रिश्ता है। गौतम बुद्ध का जन्म भारत में हुआ था। थाईलैंड ने बौद्ध धर्म की शिक्षाओं को अपनी संस्कृति, मंदिरों और दैनिक जीवन में बहुत सुंदरता से अपनाया है।
शनिवार को होटल ताज में दोनों पक्षों ने विशेष वार्तालाप की। थाईलैंड की भारत में राजदूत महामहिम चवनार्ट थंगसुम्फांत से होटल एवं रेस्तरां संघ उत्तर भारत की सतत एवं जिम्मेदार पर्यटन अध्यक्ष अंकिता जायसवाल ने दोनों देशों के बीच संस्कृति, व्यंजन, स्वास्थ्य, आध्यात्मिकता और जिम्मेदार पर्यटन के माध्यम से जन-जन के संबंधों को और अधिक मजबूत करने की संभावनाओं पर मंथन किया।
इसमें नए पर्यटन पथों के निर्माण और पर्यटकों की आवाजाही बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पर विशेष बल दिया। अंकिता जायसवाल ने कहा कि थाईलैंड की राजदूत ने इस दिशा में पूर्ण प्रोत्साहन प्रदान किया। दिल्ली में एक संयुक्त परियोजना का आयोजन किया गया था, जिसमें राजदूतावास ने अपनी अनुमति दी।
वहां राजदूत ने स्वयं बनारसी रेशम के वस्त्र धारण किए। बनारस के हजारों रेशम बुनकर इस कला के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध हैं। थायलैंड की राजदूत ने इन वस्त्रों को पहनकर यह संदेश दिया कि यदि हम एक-दूसरे देश के व्यंजन, संस्कृति और हस्तशिल्प को अपनाएं और उन्हें आगे बढ़ाएं तो संबंध और अधिक दृढ़ होंगे।
पर्यटन का अर्थ केवल एक देश से दूसरे देश की यात्रा नहीं, बल्कि स्थायी संबंध स्थापित करना महत्वपूर्ण
पर्यटन का अर्थ केवल एक देश से दूसरे देश की यात्रा करना नहीं है। यह एक-दूसरे के लोगों से मिलना, वार्तालाप करना तथा स्थायी संबंध स्थापित करना है। भविष्य का पर्यटन ऐसा होना चाहिए जो लोगों को सशक्त बनाए और सबको साथ लेकर सामूहिक उन्नति की ओर ले जाए। यह तभी संभव है जब हम अपने किसानों, कारीगरों, हस्तशिल्प तथा संस्कृति को और पड़ोसी देशों के हस्तशिल्प व संस्कृति को एक साथ लेकर चलें।
भारत के पुष्प थाईलैंड पहुंचकर नीली चाय के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। बौद्ध धर्म और संस्कृति का संबंध तो स्पष्ट है ही, साथ ही हस्तशिल्प और व्यंजनों में भी अनेक समानताएं विद्यमान हैं। इसलिए आवश्यक है कि थाईलैंड के निवासी भारत आए, यहां आध्यात्मिकता और धार्मिक स्थलों के रूप में अपार संभावनाएं हैं। आज के युवाओं का भी आध्यात्मिकता की ओर रुझान निरंतर बढ़ रहा है। दोनों देशों के बीच सदियों से चले आ रहे संबंधों को और अधिक प्रगाढ़ बनाने का यह उपयुक्त समय है।
हम हस्तशिल्प, संस्कृति, कारीगरों और किसानों को बनाएं सशक्त
अंत में गौतम बुद्ध के उस संदेश का स्मरण किया गया जिसमें उन्होंने कहा था कि मनुष्य स्वयं अपनी सहायता कर सकता है। यदि पर्यटन को सतत और दीर्घकालिक रूप प्रदान करना है तो आवश्यक है कि हम हस्तशिल्प, संस्कृति, कारीगरों तथा किसानों को सशक्त करें। इसमें हम सबका योगदान होना चाहिए। अन्य देशों के लोग भी हमारे देश में आएं, हमारे हस्तशिल्प को समझें, हमारे खान-पान को जानें और हमारी सहस्राब्दियों पुरानी वैदिक एवं प्राचीन कथाओं को ग्रहण करें। दोनों देशों के बीच शताब्दियों से विद्यमान मेल आने वाले समय में और बढ़े। भारत से थाईलैंड और थाईलैंड से भारत की आवाजाही निरंतर बनी रहे।
पर्यटन तभी फल-फूल सकता है जब हम एक-दूसरे के लोगों को जानने का दें अवसर
इस आवाजाही और पर्यटन को बढ़ाने के लिए यह समझना आवश्यक है कि पर्यटन तभी फल-फूल सकता है जब हम एक-दूसरे के लोगों को जानने का अवसर प्रदान करें। कोई भी देश अपने लोगों, हस्तशिल्प, कारीगरों, संस्कृति, किसानों तथा खान-पान से ही बनता है। एक-दूसरे के विषय में जानने का अवसर मिलने से ही संबंध मजबूत होते हैं। कारीगरों का समर्थन करते हुए बनारसी खादी के वस्त्र धारण किए गए, जिन्हें विशेष रूप से अभिकल्पित किया गया था।
पर्यटन को न बनाएं संख्यात्मक, बल्कि गहन सांस्कृतिक आदान-प्रदान का बनाए माध्यम
इस वार्ता से यह स्पष्ट हुआ कि दोनों देशों के बीच पर्यटन को केवल संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि उसे गहन सांस्कृतिक आदान-प्रदान का माध्यम बनाना चाहिए। बनारस जैसे पवित्र नगर में यह चर्चा इसलिए भी महत्वपूर्ण रही क्योंकि यहाँ गंगा के तट पर बसी प्राचीन परंपरायें तथा बौद्ध स्थल दोनों देशों के श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। थाईलैंड के पर्यटक यदि बनारस, सारनाथ, बोधगया तथा अन्य पवित्र स्थलों की यात्रा करें तो उन्हें भारत की आध्यात्मिक गहराई का प्रत्यक्ष अनुभव होगा। इसी प्रकार भारतीय पर्यटक थाईलैंड के मंदिरों, समुद्र तटों तथा स्वास्थ्य केंद्रों में अपनी रुचि के अनुसार अनुभव प्राप्त कर सकते हैं।
इस तरह हो सकता है नए व्यंजनों का सृजन
हस्तशिल्प के क्षेत्र में भी अपार संभावनाएं हैं। बनारसी रेशम, लकड़ी की नक्काशी, धातु शिल्प तथा थाईलैंड के रेशमी वस्त्र, चांदी के आभूषण तथा लकड़ी के शिल्प एक-दूसरे के बाजारों में स्थान पा सकते हैं। व्यंजनों के क्षेत्र में भी दोनों देशों की पाक कला में मसालों, चावल और शाकाहारी व्यंजनों की समानता देखने को मिलती है। यदि दोनों देशों के रसोइये और किसानों का आदान-प्रदान हो तो नए व्यंजनों का सृजन संभव है।
