वाराणसी [कुमार अजय]। Netaji Subhash Chandra Bose Birth Anniversary वर्ष 1940 की सर्दियों की ठिठुरती रात। कांग्रेस छोडऩे के बाद पहली बार बनारस आ रहे नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आगमन को लेकर नगर के छात्र-युवा बेहद उत्कंठित, बेतरह उतावले। कैंट स्टेशन से लेकर काशी हिंदू विश्वविद्यालय परिसर (जहां सभा होनी थी), तक मानो तरुणाई सड़कों पर विप्लवी अंगड़ाई ले रही हो। बाबू शिवप्रसाद गुप्त द्वारा भेजी गई खुली मोटर लेकर नेताजी द्वारा स्थापित फारवर्ड ब्लाक के तत्कालीन प्रदेश सचिव रामगति गांगुली स्वयं स्टेशन पहुंचे थे। रात का पहला पहर ढल चुका था। ट्रेन लेट आई। खुली कार में खड़े छात्र-युवाओं का अभिवादन स्वीकारते सुभाष बाबू का कारवां शहर के मुख्य मार्ग से गुजरता बढ़ चला बीएचयू की ओर। हर तरफ भीड़ की भीड़ और गगनभेदी नारों का शोर। इस उमड़ते जन-प्रवाह को पार करते।

चौराहे-चौराहे जमा नागरिकों का अभिनंदन स्वीकार करते पूरे तीन घंटों के बाद जब नेताजी बीएचयू कैंपस पहुंचे तो रात के साढ़े ग्यारह बज चुके थे। मगर छात्र-नौजवानों का मजमा टस से मस नहीं। हड्डियां भेदती तीखी बर्फीली हवाएं भी युवा शक्ति का हौसला नहीं डिगा पाईं। सुभाष धारा प्रवाह बोलते रहे और वंदेमातरम घोष के साथ घंटों ठाटें मारती रही तरुणाई।

इस सभा ने तय कर दिया कि सुभाष बाबू ही देश के युवाओं के नायक हैं। अंग्रेजी अधिनायकवाद के खिलाफ देश की आशाओं के एकमेव परिचायक हैं। सभा में बतौर श्रोता उपस्थित रहे बाबू सागर सिंह (वरिष्ठ अधिवक्ता अब दिवंगत) द्वारा सुनाए गए इस ऐतिहासिक संस्मरण को याद कर बरसों तक फारवर्ड ब्लाक के जिम्मेदार पदाधिकारी रहे अधिवक्ता संजय भट्टाचार्य भावुक हो जाते हैं। नेताजी के एक और काशी प्रवास की कथा सुनाते हैं।

बम-बम बोला बंगाली टोला

बात है सन 1938 की। सत्याग्रही आंदोलनों की शिथिलता से छात्र-नौजवानों के जोश का उबाल दूध के झाग की तरह बैठने लगा था। ऐसे में सुभाष बाबू का काशी आगमन हुआ कांग्रेस प्रमुख के रूप में। संजय बताते हैं कि उस काशी प्रवास के दौरान सुभाष बाबू ने बंगाली टोला स्कूल (सोनारपुरा) की एक जोरदार जनसभा में ऐसा जोशीला भाषण दिया कि युवाओं के बाजू फड़क उठे और बूढ़ों के रगों का खून भी उफान मार उठा। मंथर गति को प्राप्त हो रहे आंदोलन को नई रवानी मिली। बनारस के इतिहास को एक और गौरवशाली कहानी मिली।

पहली बार घर से बगैर बताए चले आए बनारस

बनारस को देखने-समझने की उत्कट अभिलाषा से किशोर सुभाष पहली बार घर से बगैर बताए वाराणसी चले आए। वे उस समय 11वीं कक्षा के छात्र थे और कुछ समवयस मित्रों के साथ परिव्रजन पर निकल पड़े थे। राम कृष्ण मिशन के स्वामी वरिष्ठानंद (अभी हाल ही में दिवंगत) ने जागरण को बताया था कि उस प्रवास के दौरान सुभाष दो-चार दिनों तक मिशन परिसर में ही रहे। यहां से फिर वह मित्रों के साथ हरिद्वार के लिए निकल पड़े। इसके अलावा भूमिगत रहने के समय भी सुभाष बाबू का दो-तीन बार बनारस आना हुआ, लेकिन ये गोपनीय यात्राएं थीं और उन दिनों वे बनारस के पक्के महाल की गलियों में स्थित अपने रिश्तेदारों के यहां ही ठहरा करते थे।

kumbh-mela-2021

शॉर्ट मे जानें सभी बड़ी खबरें और पायें ई-पेपर,ऑडियो न्यूज़,और अन्य सर्विस, डाउनलोड जागरण ऐप