संतान की दीर्घायु को माताएं तीन अक्टूबर को रखेंगी जीवित्पुत्रिका व्रत, जान लें व्रत की कथा
वाराणसी में संतान की लंबी आयु और उत्तम स्वास्थ्य के लिए जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) व्रत का अनुष्ठान 2 अक्टूबर से शुरू ...और पढ़ें

वाराणसी में जीवित्पुत्रिका व्रत 3 अक्टूबर को संतान की दीर्घायु के लिए माताएं रखेंगी निर्जला उपवास।
HighLights
जीवित्पुत्रिका व्रत अनुष्ठान 2 अक्टूबर से, मुख्य व्रत 3 अक्टूबर को।
माताएं संतान की लंबी आयु, सुख-समृद्धि के लिए रखेंगी निर्जला उपवास।
व्रत कथा जीमूतवाहन और महाभारत काल से जुड़ी है।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। संतान की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य की कामना के लिए रखा जाने वाला निर्जला जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) व्रत का अनुष्ठान दो अक्टूबर से प्रारंभ होगा। तीन दिनों तक चलने वाले इस अनुष्ठान में सप्तमी को स्नान-भोजन के बाद अष्टमी को माताएं 24 घंटे का निर्जला उपवास रखती है।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. विनय कुमार पांडेय ने बताया कि इस वर्ष आश्विन कृष्ण अष्टमी तीन अक्टूबर, शनिवार को सुबह 10:09 बजे से शुरू होकर चार अक्टूबर को प्रातः 7:45 बजे तक रहेगी। मुख्य व्रत तीन अक्टूबर को रखा जाएगा और पारण चार अक्टूबर को प्रातः 7:45 बजे के बाद नवमी तिथि में किया जाएगा।
तीन अक्टूबर को महिलाएं प्रदोष काल में मंदिरों, पवित्र कुंडों, तालाबों और घाटों पर एकत्रित होकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना करेंगी। लक्ष्मीकुंड पर लगा सोरहिया मेला इसी दिन समाप्त होगा। जिउतिया व्रत में लोकमान्यताओं और परंपराओं का पालन किया जाता है। व्रत से पहले पूर्व भोर में 'सरगी' या 'ओठगन' की परंपरा निभाई जाती है।
रात में विशेष पकवान और मिष्ठान तैयार किए जाते हैं। पूजन में सतपुतिया की सब्जी का विशेष महत्व होता है। इस व्रत की पौराणिक कथा गंधर्वराज जीमूतवाहन से जुड़ी है, जिन्होंने नागवंश की रक्षा के लिए स्वयं को गरुड़देव को समर्पित कर दिया था।
उनके इस आत्मत्याग से प्रसन्न होकर गरुड़देव ने जीमूतवाहन को पुनः जीवनदान दिया और नागों की रक्षा की। इसके अतिरिक्त महाभारत काल में इसी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरा के गर्भस्थ शिशु परीक्षित की योगमाया से रक्षा की थी।
