वाराणसी, जेएनएन। अपना गांव किसे प्यारा नहीं लगता लेकिन मजबूरी धक्के खाने के लिए शहर खींच चली जाती है। मजबूरी यह कि दो-चार भाइयों का परिवार और खेत एक-दो बिस्वा या अधिया-बटाइया। ऐसे में क्या खाएं, कहां से अन्य जिम्मेदारियां निभाएं। ऐसे में शहर जाने की विवशता हो जाती है ताकि घर बनवाने, बच्चों को पढ़ा लिखा कर साहब बनाने और बहन के हाथ पीले कराने के दायित्व पूरे किए जा सकें।

कुछ ऐसी ही कहानी है लॉकडाउन के बाद दिक्कतों-दुश्वारियों को झेलते घर चले आए प्रवासियों की। तमाम को गरीबी से उपजी टकराहटों के कारण घर छोडऩा पड़ा था। अब गांव-घर में वापसी जरूर हो गई लेकिन बच्चों के भविष्य और फांकाकशी से बचने की खातिर इंतजार है तस्वीर बदल जाने का ताकि फिर से अपने फ्रेम में फिट हो जाएं। परिवार की खुशहाली का एक मात्र नुस्खा हिट हो जाए। आमतौर पर यह कहानी हर गांव-घर की है जो फिलहाल तो परिवारीजन की जुटान से खूब मनसायन है लेकिन भविष्य को लेकर चेहरे पर चिंता की आड़ी-तिरछी लकीरें उभर ही जाती हैैं।

चार बिस्वा जमीन का आधार, पांच भाइयों का परिवार

जिले के अंतिम छोर पर स्थित चोलापुर के लखनपुर गांव में यह तस्वीर साफ दिख जाती है। पांच भाइयों का 22 सदस्यीय परिवार और गुजारे के लिए पुश्तैनी चार बिस्वा जमीन। आय के सीमित साधन के बीच वर्षों पहले दो भाइयों राजन और राजू ने घर पर ही रोजी-रोजगार का जुगाड़ किया तो तीन भाइयों छेदी, संतोष और कपिल ने मुंबई के लिए प्रस्थान किया। कोरोना संकट के कारण किराना की दुकान बंद होने पर तीनों भाई परिवार लेकर घर लौट आए हैं।

परिवार में बच्चों व विधवा मां समेत 22 सदस्यों के भरण-पोषण की समस्या मुंह बाए खड़ी है। यही नहीं छेदी की दो बेटियां विवाह योग्य भी हो चुकी हैं, ऐसे में गांव लौटने के बाद असमंजस में दिन कट रहे। फिलहाल कर्ज लेकर संतोष फेरी लगा रहे तो कपिल और छेदी सब्जी की दुकान सजा रहे लेकिन इससे खर्च भी निकल पाएगा, परिवार चल पाएगा या नहीं इसे लेकर दुविधा है।

Posted By: Saurabh Chakravarty

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस