बेनूर आंखों में थिरकती जिंदगी। पांव भी कमजोर, फिर भी आंखों में कई ख्वाब। शरीर से दिव्यांग पर आसमां को छूने की तमन्ना। ऐसी आशा हो भी क्यों न, उनका साथ उनकी चहेती दीदी दिव्या जो दे रही हैं। डा. दिव्या श्रीवास्तव दिव्यांग बच्चों के हौंसले को पंख दे रही हैं। ढाई साल से वह गरीब छात्र-छात्राओं को नृत्य सीखा रही हैं। पहले छात्रा थी तभी से इस नेक काम को करती आ रही हैं। आज नौकरी कर रही हैं, शादी के बंधन में भी बंध गई है। दिव्या रोजाना बच्चों को नृत्य की शिक्षा दे रही हैं। 

ऐसे मिली प्रेरणा
दिव्या श्रीवास्तव काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संगीत एवं मंच कला संकाय स्थित नृत्य विभाग में शोध कर रही थी। 12वीं शिक्षा के बाद ही दिव्या ने स्पीच थेरेपी में भी प्रवेश ले लिया था। साथ ही करौंदी स्थित समाकलन संस्था से जुड़ी, वहां पर गरीब व दिव्यांग बच्चे पढऩे आते थे। नृत्य से जुड़ी होने के नाते प्रबंधन दिव्या से बच्चों को नृत्य सिखाने की अपील की। छात्राओं की उम्मीद भी दिव्या दीदी से बढ़ गई। बच्चों की आंखों में नृत्य सिखने की ललक और गरीबी की बेबसी ने दिव्या को झकझोर दिया। दिव्या ने ठान लिया कि बच्चों को नृत्य की शिक्षा देंगे, वह भी एकदम फ्री।

 

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एज ग्रुप में बच्चों की क्लास
डा. दिव्या ने छात्र-छात्राओं को नृत्य सिखाने के लिए एज ग्रुप में बांटा। कारण कि धीरे-धीरे अब बच्चों की संख्या बढ़ गई है। बेहतर शिक्षा दी जाए इसके लिए यह पहल की है। सात से 14 साल तक के बच्चों अगल और 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए अगल ग्रुप बनाया गया है। दोनों ग्रुप में फिलहाल करीब 45 दिव्यांग व गरीब बच्चे डांस सीख रहे हैं।

जनवरी में जुड़ी आर्य महिला कालेज से
बीएचयू में शोध कार्य करने के बाद डा. दिव्या श्रीवास्तव इसी साल जनवरी में आर्य महिला कालेज, नागरमल से जुड़ी। यहां पर वह सुबह 10 से दोपहर तीन बजे तक बच्चों को पढ़ाती है। इसके बाद वह घर जाने से पहले समाकलन संस्था पहुंची हैं। दिव्यांग बच्चे दिव्या दीदी का इंतजार करते रहते हैं। दिव्या के पहुंचते ही दीदी-दीदी आ गईं .. कहकर संबोधित करने लगे हैं, वे एक घंटे उनको डांस की क्लास देती हैं।

सुविधाएं अपार, सिस्टम बीमार
डा. दिव्या बताती हैं कि काशी में कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में सुविधाएं अपार है। यहां पर कलाकारों के लिए प्लेटफार्म की भी कमी नहीं है। हां, सिस्टम में गड़बड़ी जरूर है, कई बार होनहार कलाकारों व विद्यार्थियों की प्रतिभा दब जाती है। अपना बेस्ट देते हैं फिर भी व्यक्ति विशेष का चयन होने से उनकी प्रतिभा वहीं दम तोड़ देती है। किसी के साथ अन्याय नहीं हो इस लिए जरूरी है कि बेहतर प्रबंधन हो। चयन कमेटी पूरी ईमानदारी एवं बिना भेदभाव का काम करे। ऐसा होने से शिक्षा का स्तर और बेहतर होगा।

 

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By Gaurav Tiwari