खुद के लिए तो हर कोई जीता है, मगर दूसरों के लिए जीने का मजा ही कुछ और है। इसे भाव को धरा पर उतारने का काम किया है, चेतन उपाध्याय ने। महज 17 साल की उम्र में इन्होंने संकल्प लिया कि मां बाप की सेवा के लिए जीवन पर्यत शादी नहीं करेंगे। माता पिता की सेवा सुश्रुषा के बीच मां तो साथ छोड़ गईं। मगर पिता की छांव तले चेतन ने जन-जन को सुकूनभरी नींद देने की ठानी। उनका एक ही उद्देश्य है, ध्वनि प्रदूषण से हर किसी को मुक्ति दिलाना। वह सालों से डीजे, माइक, साउंड बॉक्स और अन्य तीव्र ध्वनि वाले यंत्रों से लोगों को दूर करने की दिशा में काम कर रहे हैं।

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बकौल चेतन, बिना किसी राजनेता की मदद और किसी तामझाम के मुहिम चला रहे हैं। वे थाने, चौकी, गली, मोहल्ले और अड़ियों तक की दूरी महज ऑटो रिक्शा से पूरी करते हैं। लोगों को जागरूक करते हैं कि तीव्र ध्वनि का प्रयोग न करें। कम से कम गाड़ियों के हॉर्न का प्रयोग हो। मांगलिक आयोजनों पर भी रात्रि दस बजे के बाद ध्वनि यंत्रों का प्रयोग न करें जिससे कि लोग सुकून से जी सकें।

चेतना जगाने की यह मुहिम आज शहर के कोने-कोने में चल रही है। निर्धारित समय के बाद भी डीजे बजाने के आरोप में कईयों पर वह मुकदमा दर्ज करा चुके हैं। उनकी इस मुहिम में पुलिस का भी भरपूर साथ मिलता रहता है। थानों, चौकियां से लेकर तमाम सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। थानों के बाहर उनके द्वारा चलाई गई मुहिम मिसाल बन चुकी है।

चेतन उपाध्याय बीएचयू से स्नातक की उपाधि लेने के बाद उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली गए। वे वहां से पढ़ाई पूरी करने के बाद मीडिया में कुछ दिनों तक काम किए और फिर बनारस में 2000 में लौट आए। यहां आने के बाद जब देखा कि लोग ध्वनि प्रदूषण से जूझ रहे हैं, जाम की समस्या विकराल रूप धारण करती जा रही है तो उन्होंने सत्या फाउंडेशन की स्थापना की और फिर कूद गए समाजसेवा के मैदान में।

शुरू में लोगों को लगा कि यह सब हो क्या रहा है। एक आदमी ध्वनि प्रदूषण में कैसे कमी लाएगा। वह जाम से निजात दिलाने की पहल करते तो लोगों को लगता कि राजनीति के लिए यह सब कर रहा है मगर समय बीतने के साथ मुहिम परवान चढ़ने लगी। 2008 में इनके पिता के हर्निया का ऑपरेशन हुआ। तीन दिन अस्पताल में रहने के बाद घर आने पर वह सो नहीं पा रहे थे, क्योंकि आसपास होने वाली शादियों में देर रात तक बजने वाली डीजे की धुन से वह बेचैन हो रहे थे।

यहीं से चेतना जगाने की मुहिम की शुरुआत हुई। उन्होंने 100 नंबर फोन करने के साथ ही तत्कालीन एसपी सिटी राजीव मल्होत्रा से शिकायत की। इसके बाद डीजे बंद हुआ और अखबारों में उक्त खबर छपने के बाद लोगों में जागरूकता भी शुरू हुई। इसके साथ ही चेतन के अभियान को रंगत मिलती गई। वह लोगों को समझाने में सफल होने लगे कि यह समस्या महज उनकी ही नहीं बल्कि जन-जन की है।

वह अपनी संस्था के माध्यम से ध्वनि प्रदूषण के विविध आयामों और कानूनी रोकथाम को लेकर लगातार काम करने लगे। वे बाद में हेल्पलाइन नंबर 9212735622 पर गुप्त शिकायत दर्ज कराते हैं। इसकी रिकॉर्ड पुलिस को दी जाती है और फिर गोपनीय तरीके से कार्रवाई की जाती है। चेतन का कहना है कि यह अभियान मरते दम तक चलता रहेगा।

देश के कोने-कोने में अभियान
वाराणसी से शुरू हुआ यह अभियान अब देश के तमाम राज्यों में फैलने लगा है। यूपी के इलाहाबाद, चंदौली, गोरखपुर, मिर्जापुर, संत रविदास नगर (भदोही), जौनपुर, अमेठी, सुल्तानपुर, नोएडा के अलावा हरियाणा के करनाल, हिसार सहित तमाम जिलों की पुलिस लाइंस में ध्वनि प्रदूषण पर सम्मेलनों का आयोजन किया जाने लगा है। विभिन्न पुलिस ट्रेनिंग अकादमियों में भी अतिथि प्रवक्ता के रूप में दर्जनों कार्यक्रम किए गए। उनका दावा है कि उनकी पहल पर ही उत्तर प्रदेश में कांवरियों के रोड डीजे पर प्रतिबंध लगा।

मोदी-योगी से अपील
चेतन का कहना है कि उनके मन में इस बात को लेकर असंतोष रहता है कि राज्य में चुनी हुई सरकार है। फिर भी नहीं सुनी जा रही है। पीएम मोदी और सीएम योगी भी आज तक मंदिरों-मस्जिदों से माइक नहीं उतरवा पा रहे हैं।

चेतन उपाध्याय

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By Krishan Kumar