कभी कूड़े के ढेर में नन्हें हाथ जिंदगी ढूंढ़ने की कोशिश करते थे, तो कभी रेलवे स्टेशन पर बोतल बीनते-बीनते नशे के शिकार हो गए थे। आज वो पढ़ रहे हैं और जिंदगी का सलीका सीख रहे हैं। ऐसे बच्चों के लिए डॉ. आशीष का 'कुटुम्ब ग्राम' वरदान बन गया है। डॉ. आशीष ने ऐसे बच्चों को न सिर्फ उनकी स्याह जिंदगी से निकालने का काम किया बल्कि उनकी जिंदगी को शिक्षा से उज्जवल बनाने का काम कर रहे हैं। जिनके पास रहने को घर नहीं था आज उनके पास 'कुटुम्ब ग्राम' की छाया है, डॉ. आशीष के 'कुटुम्ब ग्राम' में 50 से अधिक बच्चों को शिक्षा और संस्कार से सींचा जा रहा है।

डॉ. आशीष बताते हैं कि वर्ष 2002 में मैं दिल्ली जाने के लिए कैंट रेलवे स्टेशन करीब एक घंटे पहले पहुंच गया। मैं कैंट स्टेशन पर टहल रहा था। कुछ बच्चों को कपड़े की पोटली में सफेदा नाक में लगाए सूंघते हुए देखा, वहीं कुछ बच्चे पानी का बोतल बीन रहे थे। मैं रास्ते भर इन बच्चों के बारे में सोचता रहा, दिल्ली से लौटा तो इन बच्चों से मिला। मां-बाप के बारे में पूछा तो पता लगा कि वह अनाथ हैं, फिर मन में पीड़ा हुई। लिहाजा बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया। नदेसर स्थित किराये का मकान लेकर ऐसे घुमंतू बच्चों को घर पर पढ़ाना शुरू कर दिया।

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हालांकि मौका पाते ही यह बच्चे स्टेशन पर बोतल बीनने पहुंच जाते थे, ऐसे में इन बच्चों को अपने साथ रखने का संकल्प लिया। वर्ष 2010 में बाबतपुर एयरपोर्ट रोड के पास जमीन क्रय की। 'कुटुम्ब ग्राम' नामक एक संस्था बनाई। स्टेशन पर घूमने वाले इन बच्चों को 'कुटुम्ब ग्राम' शिफ्ट किया। वर्तमान में करीब 50 बच्चे इस ग्राम में रहते हैं।

रहना-खाना भी मुफ्त
'कुटुम्ब ग्राम' में ऐसे बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ उनके रहने और खाने की व्यवस्था भी बिल्कुल मुफ्त हैं। सभी बच्चे एक साथ रहते हैं, यह बच्चे अब नशे की लत से उभर चुके हैं और समाज की मुख्य धारा में शामिल हो गए हैं।

निजी स्कूलों में दाखिला
प्रारंभिक ज्ञान के बाद डॉ. आशीष इन बच्चों का दाखिला निजी कान्वेंट स्कूलों में करा देते हैं, ताकि वह अच्छी शिक्षा हासिल कर सके। वर्तमान में एक बालिका महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में पढ़ रही है। वहीं एक और बालिका बाबतपुर स्थित निजी महाविद्यालय में पढ़ रही है।

'कुटुम्ब ग्राम' में विभिन्न आयु वर्ग के बच्चे एक साथ रह रहे हैं। डॉ. आशीष बताते हैं कि इन बच्चों पर प्रतिवर्ष फीस पर तीन लाख रुपये खर्च हो रहा है। यह खर्च आपसी सहयोग से किया जा रहा है। एक भी पैसा सरकार से अनुदान नहीं लिया जा रहा है।

स्कूल की नहीं विजन की कमी
नगर में स्कूल की कमी नहीं है। निजी और सरकारी दोनों पर्याप्त संख्या में हैं। हालांकि सरकारी विद्यालयों से लोगों का विश्वास उठ गया है। वहीं निजी विद्यालय गरीब आदमी के दायरे से बाहर हैं। कुल मिलाकर स्कूल की नहीं विजन की कमी है। निजी विद्यालयों के फीस का मानक तय करना होगा। वहीं सरकारी विद्यालयों को दुरुस्त करना होगा। अध्यापकों की जिम्मेदारी तय करनी होगी, तभी बुनियादी शिक्षा मजबूत होगी। बुनियादी शिक्षा में शिक्षकों की अब कमी नहीं रह गई है।



एक समान शिक्षा की जरूरत
निजी विद्यालयों से शिक्षा का बाजारीकरण बढ़ रहा है। ऐसे में एक समान शिक्षा नीति की जरूरत है। जब एक देश-एक टैक्स की व्यवस्था लागू की जा सकती है तो शिक्षा व्यवस्था अलग क्यों। निजी विद्यालयों का वर्चस्व बढ़ने से शिक्षा महंगी होना तय है।

चंद कमरों में संचालित हो रहे विद्यालय
जनपद में तमाम ऐसे विद्यालय हैं जो चंद कमरों में चल रहे हैं। इसमें सरकारी विद्यालय भी शामिल हैं। इन विद्यालयों के पास बच्चों के खेलने के लिए मैदान तक नहीं हैं। ऐसे में खेल प्रशिक्षक का सवाल ही नहीं उठता। बच्चों के शारीरिक विकास खातिर खेलकूद का महत्व है। विद्यालय का मुख्य उद्देश्य बच्चों का शारीरिक और बौद्धिक विकास करना होता है।

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By Nandlal Sharma