वाराणसी, जेएनएन। तुलसीघाट और उसके आसपास के पक्के घाटों पर नहाने जाएं तो जरा संभलकर। दो चार सीढिय़ों के बाद इस घाट पर बड़े-बड़े गड्ढे बने हैं जो जानलेवा हैं। गंगा के कटाव कारण बने इन गड्ढों के कारण इस घाट पर डूबने की घटनाएं अधिक होती हैं जबकि इस घाट पर दशाश्वमेध घाट की तुलना में बहुत कम लोग स्नान करने आते हैं। पिछले दो वर्ष में एक दर्जन से अधिक लोग इस घाट पर मौत के मुंह में समा गए हैं। 

आंकड़ों पर गौर करें तो मीरघाट, ललिता घाट, जलासेन घाट, चौसट्टी, सिंधिया और पंचगंगा घाट भी कम खतरनाक नहीं हैं। दशाश्वमेध थाना क्षेत्र के दशाश्वमेध घाट, राजेंद्र प्रसाद घाट, मीरघाट, ललिता घाट, जलासेन घाट, और चौसट्टी घाट पर ही वर्ष 2018 में 55 लोग और 2019 में अब तक 22 की जान जा चुकी है।

यह स्थिति तब है जब दशाश्वमेध घाट पर जल पुलिस की फौज तैनात है। विशेष अवसरों को छोड़ दिया जाए तो जल पुलिस कभी भी स्नानार्थियों को कोई दिशा निर्देश नहीं देती है, जबकि यहां प्रतिदिन सैकड़ों लोग स्नान करने के साथ अन्य धार्मिक क्रियाओं को करने आते हैं। दक्षिण भारतीय लोगों की बड़ी संख्या यहां वर्ष भर आती रहती है। सिंधिया, पंचगंगा और नक्खी घाट पर भी दो वर्ष में छह लोगों की मौत हो चुकी है। साथ ही सामने घाट क्षेत्र में दो साल में पांच लोग डूबकर मरे हैं।

लगाना चाहिए संकेतक

जन सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए नगर निगम और विकास प्राधिकरण को ऐसे घाटों पर संकेतक लगाना चाहिए जहां स्नान करना खतरे से खाली नहीं है। लगातार बढ़ रही घटनाओं के मद्देनजर यह जरूरी है। साथ ही जल पुलिस की ओर से मोटर बोट के माध्यम से सुबह के समय चेतावनी भी जारी करनी चाहिए।

तैरना नहीं आता तो जरा संभलकर

दिल्ली के रोहित अपने पितरों का तर्पण करने वाराणसी आए थे सपरिवार। रविवार को तुलसी घाट पर ही स्नान के दौरान गहरे पानी में चले जाने से उनकी मौत हो गई। जल पुलिस और एनडीआरएफ का सुझाव है कि जिन लोगों को तैरना नहीं आता, उन्हें घाट पर संभलकर स्नान करना चाहिए। जिन घाटों पर भीड़ हो, वहां स्नान करें। तैरना नहीं आता तो घाट की सीढिय़ों पर बैठकर नहाएं। 

Posted By: Abhishek Sharma

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