वाराणसी [प्रमोद यादव] । क्षीर सागर में शेष शैया पर चार मास से शयनरत प्रभु श्रीहरि कार्तिक शुक्ल एकादशी तद्नुसार 19 नवंबर को जागेंगे। श्रद्धालुजन इस अवसर को हरिप्रबोधिनी एकादशी के रूप में मनाएंगे लेकिन शादी-विवाह समेत मांगलिक कार्यों के लिए इंतजार कर रहे लोगों के अरमान फिलहाल धरे रह जाएंगे। 

वास्तव में शादी-विवाह समेत मांगलिक कार्यों के कारक ग्रह गुरु बृहस्पति हरि प्रबोधिनी एकादशी से छह दिन पहले यानी 13 नवंबर को दोपहर बाद 3.54 बजे पश्चिम में अस्त हो जा रहे हैं। उनका उदय नौ दिसंबर की भोर 5.08 बजे पूर्व में होगा। इसके बाद तीन दिनों तक बालत्व के कारण भी रोड़ा बना रहेगा। ऐसे में हरि प्रबोधिनी एकादशी के बाद भी शादी- विवाह समेत मांगलिक कार्यों के लिए 26 दिन इंतजार करना होगा। 

ख्यात ज्योतिषाचार्य ऋषि द्विवेदी के अनुसार आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चार मास चातुर्मास के नाम से जाना जाता है। इस अवधि में प्रभु श्रीहरि क्षीर सागर में शयन करते हैं और सभी तरह के शुभ कार्य वर्जित रहते हैं। उनके जागरण के साथ चातुर्मास समाप्त होता है और शुभ कार्य भी शुरू हो जाते हैं लेकिन इस बार हरि प्रबोधिनी एकादशी गुरु अस्त में होने से इसमें देर होगी। शुभ कार्य के कारक ग्रह के अस्त होने से शुभ कार्यादि 15 दिसंबर से शुरू होंगे। शुभ कार्यों के कारक ग्रह के देर से उदय होने के कारण दिसंबर में विवाह की सिर्फ दो ही लग्न 15 व 16 दिसंबर को मिल रही है। दूसरी लगन तिथि 16 दिसंबर की शाम 6.25 बजे भगवान भास्कर के वृश्चिक से धनु पर जाते ही खरमास लग जाएगा। इसके बाद मकर संक्रांति बाद लगन-मुहूर्त का संयोग बन पाएगा। 

Posted By: Abhishek Sharma