वाराणसी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सोच से उपजी काशी विश्वनाथ धाम की परिकल्पना दिव्य-भव्य स्वरूप लगभग साकार रूप ले चुकी है। इसमें बाधाएं कम न थीं, लेकिन जनसहयोग खूब मिला और इसका योग बनता गया। खास यह कि खरीदे गए भवनों का जाल जैसे-जैसे हटता गया, एक से बढ़ कर एक मंदिर सामने आते गए। इतने मंदिर बनारस की मौजूदा पीढ़ी ने भी एक साथ शायद ही देखे होंगे। श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर विस्तारीकरण-सुंदरीकरण परियोजना पर दैनिक जागरण के वरिष्ठ संवाददाता प्रमोद यादव और जेपी पांडेय ने मंडलायुक्त व मंदिर कार्यपालक समिति के अध्यक्ष दीपक अग्रवाल से बातचीत की। प्रस्तुत है प्रमुख अंश...

0-काशी विश्वनाथ दरबार को यह रूप देने की सोच कहां से उपजी?

-काशी के स्तंभ हैं बाबा विश्वनाथ व गंगा। बिना इनके काशी की कल्पना नहीं की जा सकती। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि कभी काशी में विश्वनाथ व गंगा एकाकार थे जो कालांतर में अलग हो गए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सोच से बाबा दरबार से गंगधार तक कारिडोर के जरिए पुरातन स्वरूप को साकार किया गया है।

0-कारिडोर का खाका कब खींचा गया?

-प्रधानमंत्री जी के मन मेें यह पहले से रहा होगा कि बाबा दरबार तक श्रद्धालुओं की राह सुगम हो। प्रदेश में सरकार बनने के साथ इस दिशा में विचार-विमर्श शुरू हुआ। मंदिर न्यास के जरिए कार्य करने में तकनीकी बाधाएं थीं। ऐसे में मुख्यमंत्री के निर्देश पर 2018 में श्रीकाशी विश्वनाथ विशिष्ट क्षेत्र विकास परिषद का गठन कर विशेष प्रविधान कराया गया इसका ही फल रहा कि सब कुछ सहजता से होता गया।

0-सोच पर कितना खरा उतर पाया प्रोजेक्ट?

-सोच और प्लान दोनों ही व्यापक थे। तय था मूल मंदिर के साथ जरा भी बदलाव नहीं करना है। प्राथमिक डिजाइन के अनुसार 197 भवन सहमति से खरीदने थे। तय था अनिवार्य अधिग्रहण नहीं करना है। लोग आते गए और बात बनती गई। बाद में कारिडोर को सीधा करने के लिए भवन बढ़ाने पड़े और 314 भवनों की खरीद की गई। सब कुछ प्लान अनुसार होता गया। बेहतरी के लिए सुधारात्मक संशोधन भी किए गए। परिणाम सामने है।

0-जमीन की व्यवस्था कैसे संभव हो पायी?

-पहले से तय था कि अनिवार्य अधिग्रहण में नहीं जाएंगे। सहमति से भू व्यवस्था की जाएगी। मंदिर दफ्तर में रजिस्ट्री की व्यवस्था की गई ताकि लोगों को भागदौड़ न करनी पड़े। ऐसे भी भवन सामने आए जिसमेें 17-17 साझीदार थे। सभी से बात की गई। सहमति से तीन सौ से अधिक भवन खरीद लिए गए। वहीं 1400 लोगों का पुनर्वास किया गया। आज एक भी केस पेंडिंग नहीं है।

0-ट्रस्ट भवनों और मंदिरों का कितना सहयोग रहा?

-चिह्नित क्षेत्र में तीन तरह के भवन थे। इनमें व्यक्तिगत के अलावा ट्रस्ट की 17 संपत्ति व सेवइतों के अधीन 27 भवन -मंदिर थे। काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास परिषद में पारित कर इन संपत्तियों को लिया गया। सेवइतों के भी पुनर्वास की व्यवस्था की गई। कई मठों-आश्रमों के लिए खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पहल की और संबंधित को बातचीत के लिए बुलाया।

0-मंदिरों को तोडऩे और विग्रहों के साथ छेड़-छाड़ के आरोप लगे?

-एक ऐतिहासिक कार्य में भी हतोत्साहित करने का कुछ तत्वों ने प्रयास किया। मंदिरों को तोडऩे, स्वरूप बिगाडऩे समेत अन्य अफवाह उड़ाई गई। उसे इंटरनेट मीडिया और अखबार के माध्यम से स्पष्ट करते हुए जनता तक सचाई पहुंचाई गई। वास्तव में जैसे-जैसे भवन ध्वस्त किए जाते रहे। कई मंदिर सामने आते रहे। देखने से जो समझ में आया, वह यह कि सेवइतों ने देव विग्रहों के आसपास रहने का इंतजाम किया। बाद में बंटवारे के साथ कमरे बढ़ते गए और मंदिर मकान के भीतर समाता गया। हम विग्रहों व मंदिरों को संरक्षित कर रहे। यही कारण है कि काशी के लोग वैसे-वैसे मंदिर देख सकेंगे जो यहां के पुराने मकानों के अंदर ढक गए थे। इन मंदिरों की हालत भी बहुत खराब थी। ऐसे भी मंदिर मिले जिससे सटे शौचालय बना लिए गए थे।

0-कारिडोर व बीच में मिले मंदिरों के बीच कैसे समन्वय संभव हो पाया?

-ध्वस्तीकरण के दौरान विग्रह मिले, घरों में छोटे मंदिर और शिखर वाले बड़े मंदिर भी सामने आए। विग्रहों का विधि विधान से स्थान परिवर्तन किया गया। बड़े मंदिरों के साथ ही छोटे मंदिरों को भी सम्मान दिया गया। अभी शिखर वाले 25 बड़े मंदिरों में से 17 का जीर्णोद्धार करा रहे। हालांकि इनसे वैदिक केंद्र का स्थान बदलना पड़ा। अतिथि गृह व मुमुक्षु भवन छोटा करना पड़ा। विग्रहों को स्थापित करने के लिए परिसर में 27 छोटे-छोटे मंदिर बन रहे हैैं। पहले जो मंदिर जर्जर थे, संवारे जा रहे। मुख्य परिसर में भी पंचायतन स्वरूप बरकरार रखने के लिए सात मंदिर बना रहे।

0-तय समय सीमा का कितना पालन हो पाया?

-प्रधानमंत्री ने आठ मार्च 2019 को शिलान्यास किया। बाधाएं दूर कर 2020 जनवरी में कार्य शुरू हुआ। निर्माण में 18 माह का लक्ष्य था। बाद में बढ़े कार्य अनुसार समयावधि बढ़ाई गई। कोरोना काल व बाढ़ के दौरान भी काम चलता रहा। सब कुछ तय टाइम लाइन अनुसार चलता रहा। अब समय आ गया है जब लोकार्पण होगा जो काशी ही नहीं देस- विदेश के श्रद्धालुओं को अनूठा अहसास देगा। सड़क व जल मार्ग से श्रद्धालु आ सकेंगे। कारिडोर में बनारस को देख पाएंगे, समझ पाएंगे, महसूस कर पाएंगे। जप-तप करते हुए अध्यात्म की गंगा में गोते लगाएंगे।

Edited By: Saurabh Chakravarty