वाराणसी [कुमार अजय ]। वार्धक्य के बाद भी अपनी चिर जीवंतता व पुरातन वैभव के दम पर देश-दुनिया की स्मार्ट नगरियों के चकाचौंध को चुनौती देते शहर बनारस के टोले-मोहल्ले भी इतिहास-भूगोल व दर्शन के तमाम तत्वों को अब भी प्राण पखेरू की तरह सहेजे हुए हैं। समयकाल के सीधे-उल्टे थपेड़ों के चलते धरोहरों और थतियों की रंगत में थोड़ा फर्क जरूर आया है, फिर भी यह काशी बड़ी ही शान से अपने अतीत की कथाएं सुनाती है। धरोहरों की ईंट-ईंट अपने स्वर्णिम काल के वैभवी तराने गाती है। अब काशी के पुराने मोहल्लों के बाकपन पर ही नजर डाल लें पुरानी भीतिया दरकने लगीं हैं।

रस्म-रिवाजों की डोर भी चुटकियों से सरकने लगी हैं। फिर भी उनका बीता हुआ कल उनकी इस सामयिक चोट को सहलाता है। मन उदास हो तो भाव गीतों की लड़ियों से उन्हें बहलाता है। दारानगर मोहल्ले के पास शहजादे दाराशिकोह के फरामनी दस्तावेजों की निशानी है। चेतगंज मोहल्ले के पास जन्मना विद्रोही राजा चेतसिंह के कठिन संघर्ष की कहानी है। जतनबर मोहल्ले ने गौराग प्रभु चैतन्य के चरण चिह्नों को संभाल रखा है तो कबीरचौरा ने अब तलक संत साहेब के निर्मल ज्ञान का दीया बार रखा है। इसी क्रम में चर्चा कभी आनंद-कानन काशी के अभिन्न अंग रहे भद्रवन क्षेत्र की। भदैनी, अस्सी, शिवाला से भेलूपुर तक पसरी इस रिहायशी बस्ती विशेष के पास थाती के रूप में मौजूद है। 17-18वीं सदी में कायम सामंतशाही दौर के शिल्प वैभव की निशानिया। युगावसान के बाद भी खड़े रहने की अपनी कूबत बया करती सच बोलती कहानियां।

कथा पेशवाई की शुरुआत करते हैं बिखरती पेशवा राजशाही के अंतिम दिनों की चर्चा से। 17वीं सदी के उत्तरा‌र्द्ध में अंग्रेजों की लक्खा पेंशन लेकर काशी लाभ के लिए यहा पहुंचे पेशवा अमृत राव ने गंगा के दक्षिणी पाट पर अवस्थित भदैनी को ही अपना स्थाई प्रवास केंद्र बनाया। अपने पेशवाई मिजाज के मुताबिक ही अमृत राव जी ने कुंडों, सरोवरों, घाटों के अलावा गणेशबाग से दुर्गाकुंड तक के बीच कई अंगनाइयों का निवास भी बनवाया। उन्हीं के सरदार मोरोपंत ने अपनी पुत्री मनु का विवाह झासी स्टेट में कराकर देश के इतिहास को रानी लक्ष्मीबाई के पराक्रम से परिचित कराया। पेशवा जी की अस्सी स्थित हवेली व गणेश मंदिर अब वजूद में नहीं रहे। अलबत्ता दुर्गाकुंड के उत्तरी छोर पर बनाई गई इमारत की लंबी दीवार उसके छत-छच्जों का सौंदर्य आखों को बाधता है। झारखंड की सामंतशाही की निशानी अस्सी चौराहे के पूर्वी छोर पर छोटा नागपुर स्टेट का बागीचा उस दौर के एक आदिवासी सामंत के प्रकृति प्रेम व श्रद्धा आस्था का गवाह है। हवेली भले ही न हो बागीचे की प्राचीरें व जगन्नाथ मंदिर का खूबसूरत मंडप राची के समीपस्थ छोटा नागपुर स्टेट के वैभव की गवाही देते हैं।

किला चेतसिंह : गवाही पहले स्वतंत्रता समर की भदैनी से ही जुड़े शिवाला क्षेत्र के गंगा घाट पर आज भी सीना ताने खड़ा भव्य किला 1817 की गदर से भी बहुत पहले लॉर्ड वारेन हेस्टिंग्स को शहर बनारस की ओर से दी गई शिकस्ती, पटखनी की याद दिलाता है। बरतानवी नाइंसाफी के खिलाफ सबसे पहले तलवार सुंत लेने वाले विप्लवी राजा चेतसिंह के अदम्य पराक्रम की कथा सुनाता है। विजयनगरम स्टेट का रुतबा भदैनी-शिवाले से ही जुड़े भेलूपुर में दक्षिण भारतीय राजकुल विजयनगरम पैलेस का वजूद इस समय सिर्फ उसके सिंह द्वार की भव्यता के हवाले है। कभी कुमार विच्जी (भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान) की ख्याति से महिमा मंडित पैलेस का लगभग पूरा परिसर अब व्यावसायिक केंद्र में बदल चुका है। फिर भी कुल के वंशज अभी यहीं पर निवास करते हैं और आज के वर्तमान में अतीत के रंग भरते हैं। विजयगढ़ किला सरनाम स्व. देवकीनंदन खत्री के मशहूर तिलस्मी उपन्यास चन्द्रकांता में वर्णित विजयगढ़ दुर्ग मिर्जापुर की अस्सी स्थित हवेली तक भी बाजार की बयार पहुंच रही है। फिर भी हवेली का रख-रखाव अब तक टंच है।

किसको-किसको बताएं कहां तक गिनाएं : जहां तक गिनती का सवाल है। भद्रवन क्षेत्र के भदैनी, अस्सी शिवाल तथा भेलूपुर तक की ही परिधि में शिवहर स्टेट बिहार, रीवा कोठी मध्य प्रदेश, अस्सी पर ही डुमराव राज्य बिहार, बड़हर कोठी बिहार, बनारस हवेली, नागौर कोठी, अमेठी कोठी, पंचकोट बंगाल, अवसानगंज हवेली, मझौली कोठी, बरेली कोठी, शिवचंद कोठी व भीटी कोठी का वजूद कायम है। इनमें से कुछ व्यावसायिक केंद्रों में तब्दील हो चुके हैं तो कुछ देख-रेख के अभाव में खंडहर हो रहे हैं। यह जरूर हैं कि इन धरोहरों की एक ईंट भी बच गई है तो वह है हमारी थाती। यह भाव बनाए रखने की जरूरत है क्योंकि हमारा रुपहला कल ही हमारे आज के सुनहरे बनारस की ख्याति का चमकता सूरज है। काशी लाभ की अभिलाषा व पूर्णता की आशा, सभी को बुलाती है काशी कहते हैं भद्रवनी क्षेत्र की इन कोठियों- हवेलियों के कथ्य-तथ्य के जानकार तथा प्राध्यापक पं ध्रुव पाडेय काशी लाभ की अभिलाषा और पूर्णत्व प्राप्ति की चिर आशा ही राजे-रजवाड़ों, संतों-विद्वानों को युगों से आवाज देकर काशी बुलाती रही है।

राग-विराग के अलग-अलग रंगों से उन्हें नहलाती रही है। यह बात अलग है कि इस ज्ञान गंगा में किसने कितना गहरा गोता लगाया। कितना हाथ से छूट गया और कितना अपने पास आया। इस स्थापित तथ्य के बीच एक उल्लेखनीय बात यह भी कि महाराष्ट्र के हों या गुजरात के। बिहार के हों या सौराष्ट्र के जिसने भी यहा दीवारें उठाई छत तनवाया सबने इस छत के नीचे अपने ईष्ट का मंदिर जरूर बनवाया। गौरतलब यह भी कि समयकाल की मार से इमारतें भले ही झुक गईं हों। नीरव-निर्जन हो गई हों पर इनके साथ स्थापित मंदिरों में ज्यादातर को नियमित पूजा-टहल प्राप्त है।

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