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काशी में रात हो उठी जीवंत, बरसात के बीच सड़कों पर आस्‍था का उमड़ा जनज्‍वार, कहलाता है 'नक्‍कटैया लक्‍खा मेला'

By Digital Desk Edited By: Abhishek sharma
Published: Fri, 30 Oct 2026 01:12 PM (IST)

अर्नब चक्रवात की भारी बारिश के बावजूद, वाराणसी के चेतगंज में विश्वप्रसिद्ध नक्कटैया मेले में आस्था का जनसैलाब उमड़ पड़ा। ...और पढ़ें

बारिश में भी नहीं डिगी आस्था, वाराणसी के चेतगंज नक्कटैया मेले में उमड़ा जनसैलाब।

बारिश में भी नहीं डिगी आस्था, वाराणसी के चेतगंज नक्कटैया मेले में उमड़ा जनसैलाब।

HighLights

  1. भारी बारिश में भी चेतगंज नक्कटैया मेले में उमड़ी भीड़।

  2. शूर्पणखा नासिका छेदन लीला, भव्य लाग-विमानों की शोभायात्रा।

  3. आधुनिकता-परंपरा का संगम, एयर शो व सामाजिक संदेश।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। रिमझिम फुहारों और सुहानी हवाओं के बीच काशी की अगाध आस्था मौसम की हर दुश्ववारी पर भारी पड़ गई। हाथों में छाता थामे और रेनकोट पहने आस्थावानों का हुजूम गुरुवार की रात चेतगंज की विश्वप्रसिद्ध नक्कटैया के ऐतिहासिक गवाह बनने के लिए सड़कों पर उतर आया।

अर्नब चक्रवात की वजह से रात भर बारिश का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा था, लेकिन न तो कलाकारों का जोश डिगा और न ही अपनी प्राचीन परंपराओं को सजीव रूप में देखने का बनारसियों का चिर-परिचित अल्हड़ मिजाज कम हुआ। भींगने से बचने के लिए लोग दुकानों के शेड, मकानों के बारजों और छज्जों के नीचे जमे रहे, लेकिन अपनी जगहों से टस से मस नहीं हुए।

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शूर्पणखा नासिका छेदन से गूंजा चेतगंज, लगा 'जय श्रीराम' का उद्घोष

रात में टोटो और पारंपरिक वाहनों से लीला के पात्र चेतगंज पहुंचे। भगवान श्रीराम के रथ के समीप जैसे ही रामायणकालीन प्रसंग के तहत शूर्पणखा के नासिका छेदन की सजीव लीला का मंचन हुआ, पूरा इलाका 'जय श्रीराम' और 'हर हर महादेव' के गगनभेदी जयकारों से गूंज उठा। इसके बाद शूर्पणखा की भव्य झांकी मलदहिया पटेल चौराहा होते हुए चेतगंज थाने के समीप पहुंची, जहां पारंपरिक लाग-विमानों का औपचारिक शुभारंभ किया गया।

आधी रात को रंग-बिरंगे झालरों और बहुरंगी रोशनी से नहाई सड़कों पर रामधुन की गूंज के बीच जब सौ से अधिक लाग-विमानों का कारवां आगे बढ़ा, तो बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी की रात जगमगा उठी। मलदहिया से शुरू होकर लहुराबीर, चेतगंज और पानदरीबा तक करीब पांच किलोमीटर के इस विस्तृत दायरे में भोर तक मेले का यह अद्भुत और विहंगम उल्लास बना रहा।

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140वें पड़ाव में दिखा आधुनिकता और परंपरा का अनूठा संगम

इस बार के 140वें ऐतिहासिक पड़ाव में प्राचीन परंपरा के साथ-साथ समकालीन गौरव और सामाजिक सरोकारों का बेजोड़ संगम देखने को मिला। हाल ही में गंगा के ऊपर वायु वीरों के शौर्य प्रदर्शन की गूंज के बीच नक्कटैया में भी एयर शो का विशेष आकर्षण छाया रहा। लाग-विमानों में भारत के आधुनिक रक्षा सामर्थ्य के प्रतीक तेजस, सुखोई और राफेल जैसे लड़ाकू विमानों की भव्य और कलात्मक प्रतिकृतियों ने भारतीय वायुसेना के पराक्रम को जीवंत कर दिया।

इसके साथ ही, आध्यात्मिक आस्था के केंद्र कैंची धाम के बाबा नीम करौली की अलौकिक झांकी और वर्तमान समय में बच्चों व युवाओं पर मोबाइल के बढ़ते दुष्प्रभावों को बेहद संजीदगी से दर्शाती लाग ने उपस्थित जनमानस को गहराई से झकझोरा। इस मेले में काशी सहित प्रयागराज, मिर्जापुर, जौनपुर, भदोही, आजमगढ़, चंदौली और सोनभद्र से आए कलाकारों ने अपने हैरतअंगेज करतबों और जीवंत प्रस्तुतियों से दर्शकों को भोर तक बांधे रखा।

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ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जनचेतना जगाने को शुरू हुई थी परंपरा

इतिहास के पन्नों को पलटें तो चेतगंज नक्कटैया मेला की नींव पराधीन भारत में वर्ष 1888 में स्व. बाबा फतेह राम द्वारा अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचारों और दमनकारी नीतियों के मुखर विरोध के लिए रखी गई थी। ब्रिटिश काल की तमाम बंदिशों को धता बताते हुए स्वांग, लाग-विमान और लोक प्रदर्शनों के जरिए आम जनमानस में चेतना जगाने की यह अनूठी परंपरा शुरू की गई थी, जो आज भी अपनी पूरी भव्यता के साथ जीवित है।

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नहीं सजीं ठेला-पटरी की दुकानें, फीकी पड़ी दूर-दराज की भीड़

हालांकि, इस बार झमाझम बारिश ने मेले की रंगत में थोड़ी बाधा जरूर डाली। बारिश के कारण मेला परिसर में ठेला-पटरी लगाकर अपनी आजीविका चलाने वाले दुकानदार दुकानें नहीं सजा सके। चौबेपुर से मिट्टी के सुंदर खिलौने लेकर आए राजहंस ने दर्द साझा करते हुए बताया कि वे पिछले तीन महीने से इस मेले की तैयारी कर रहे थे और दुकान लगाने का इंतजार करते रहे, लेकिन बारिश ने थमने का नाम नहीं लिया। वहीं, चाट का ठेला लेकर खड़े रामचंद्र ने कहा कि लगातार बारिश ने मेले के बड़े आनंद को फीका कर दिया।

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दूर-दराज से आने वाले दर्शकों की संख्या भी इस बार बारिश के कारण न के बराबर रही। जो चुनिंदा लोग मेला देखने पहुंचे थे, वे सड़क किनारे शेड के नीचे से ही लाग-विमानों के दर्शन करते रहे। इसके अलावा, भारी मानसूनी बारिश के कारण विभिन्न साज-सज्जा और सामान के साथ आए कलाकारों को तैयार होने में भारी कठिनाई का सामना करना पड़ा।

बार-बार मेकअप धुल जाने से कलाकारों को अपनी प्रस्तुति से पहले काफी संघर्ष करना पड़ा और बारिश के प्रकोप से बचने के लिए उन्हें अंततः रेनकोट, छाता तथा प्लास्टिक शीट का सहारा लेना पड़ा। तमाम प्रशासनिक और मौसमी चुनौतियों के बावजूद काशी के लोगों का यह सांस्कृतिक पर्व अपनी पूरी दिव्यता के साथ संपन्न हुआ।