बलिया, जेएनएन। जय प्रकाश नारायण और बलिया जिले के जेपी लगभग राजनीतिक दलों के लिए सदैव खास रहे हैं। आपातकाल की बरसी हो या जयंती वे पुज्यनीय हो जाते हैं। जब कोई चुनाव आता है तो वही जेपी सबके आदर्श बन जाते हैं। लेकिन दुखद कि संपूर्ण क्रांति के प्रणेता उसी जेपी के गांव जाने वाली सड़क का आजतक कायाकल्प नहीं हो सका। यहां की पतली सी बीएसटी बांध की यह सड़क ही बयां कर देती है कि कौन जेपी का सच्चा भक्त है। जेपी की तमाम यादों को समेटे चौड़ीकरण की आस में अब तो यह सड़क बुढ़ी हो चली है। सिताबदियारा में यूपी और बिहार दोनों सीमा के लोगों के लिए यह लाइफ-लाइन भी कही जाती है। इसलिए कि यूपी-बिहार दोनों तरफ के लोग इसी सड़क पर चलते हैं। शाीर्ष नेताओं से लेकर दूर-दराज के शोधकर्ता भी जेपी को नमन करने इसी सड़क जेपी के गांव सिताबदियारा पहुंचते हैं। बैरिया, बलिया, छपरा आदि स्थानों के लिए विभिन्न प्रकार के वाहन इसी सड़क से होकर सिताबदियारा जाते हैं। इसके बावजूद भी जेपी के भक्तों की नजरों से यह सड़क गायब हैं। जबकि जेपी भक्तों की सूची देखी जाए तो देश भर में लम्बी लिस्ट है। आज भी लगभग दलों के नेता जेपी को अपना आदर्श मानते हैं। 

जेपी के गांव के निवासी जैनेंद्र सिंह बताते हैं कि यह बांध पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के काल में ही बना था। जब यह बांध बन रहा था, तब स्वयं चंद्रशेखर खड़ा होकर इसके कार्यों की निगरानी करते थे। उससे पहले सिताबदियारा जाने के लिए दूसरी कोई सड़क नहीं हुआ करती थी। लोग नौ किमी पैदल चलकर टोला शिवनराय, पांच किमी नदी उस पार रिविलगंज जाकर बैरिया, बलिया या छपरा के लिए वाहन पकड़ते थे। किसी तरह बीएसटी बांध जब से पीच हुआ तब से वाहनों का परिचालन शुरू हुआ। इस गांव से छपरा, बैरिया, बकुल्हा व बलिया के लिए कुल मिलाकर लगभग 75 वाहन चलते हैं। पटना के बिहार की ओर एक बस और प्राइवेट तौर पर सिताबदियारा से बलिया के लिए दो बसें चलती हैं। जयप्रकाशनगर से रिपोर्टिंग पुलिस चौकी चांददियर तक कुल नौ किमी दूरी की इस सड़क की चौड़ीकरण और मजबूत निर्माण के लिए लोग चिल्लाते रह गए लेकिन न तो इसका ढ़ंग से मरम्मत हुआ और न ही चौड़ीकरण। जगह-जगह यह सड़क लंबे समय से टूटी पड़ी है। यूपी-बिहार सीमा के प्रभुनाथनगर पंचायत, यूपी सीमा इब्राहिमाबाद नौबरार, नई बस्ती बड़का बैजू टोला, टोला बाज राय आदि गांवों के निवासियों के आवगमन के लिए भी यही सड़क हैं। 

   

हिचकोले से ही पूरी हो जाती आधी कहानी 

जेपी के गांव में यूपी-बिहार के लोगों को जोडऩे वाली यह सड़क यहां इसलिए भी खास है कि इसी मार्ग से होकर दूर-दराज के कई विशिष्ट व्यक्ति जेपी के गांव जेपी संग्रहालयों पर शोध करने पहुंचते हैं। लेकिन वहां जाने के क्रम में जब उनका सामना सड़क के हिचकोले से होता है तो उनकी आधी कहानी रास्ते में ही पूरी हो जाती है। बाढ़ के दिनों में यही वह बांध है जिस पर बाढ़ प्रभावित गांवों के लोग आकर शरण लेते हैं। 

आडवाणी के कार्यक्रम में भी करना पड़ा था बदलाव 

बीएसटी बांध की इस पतली सड़क के चलते ही वर्ष 2011 में सिताबदियारा से निकलने वाली भाजपा के शीर्ष नेता लाल कृष्ण आडवाणी की जन चेतना यात्रा में परिवर्तन करना पड़ा था। इस यात्रा के लिए जो बस तैयार की गई थी, वह जेपी के गांव तक नहीं पहुंच सकी। नतीजन यहां केवल आम सभा को संबोधित कर आडवाणी की वह यात्रा बस के द्धारा छपरा से शुरू हुई। 

तब नीतीश ने कहा था-यूपी कहे तो यह सड़क मै बना दूं

वर्ष 2011 में लाल कृष्ण आडवाणी की उसी जन चेतना यात्रा के दौरान सिताबदियारा की सभा में बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने इस सड़क पर चुटकी ली थी। सड़क की खराब दशा को देख खुले मंच से यहां तक कह दिया कि यह जेपी के गांव आने वाली सड़क है। इसे हर हाल में बेहतर होना चाहिए। लेकिन यह सड़क यूपी के जिम्मे हैं। यदि यूपी कहे तो इस सड़क को मै ही बना दूं। इसके बाद भी यूपी की सरकारों ने इस सड़क की सुधि लेना जरूरी नहीं समझा। सरकारें आती-जाती रही और यह सड़क भी पुराने अंदाज में रह गई। 

दोनों सीमा में जेपी के नाम पर है संग्रहालय

यूपी-बिहार दोनों सीमा में बंटे सिताबदियारा में अब यूपी बिहार दोनों सीमा में ट्रस्ट है। यूपी के जयप्रकाशनगर में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने जेपी निवास के पास जेपी नारायण स्मारक प्रतिष्ठान की स्थापना की है। वहीं अब बिहार सीमा के लाला टोला में बिहार के सीएम नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रीय जेपी संग्रहालय का निर्माण कराया है। केंद्र से लेकर राज्य तक भाजपा की सरकार है इसके बावजूद भी इस सड़क का कायाकल्प नहीं होना, जेपी की भक्ति पर भी कई तरह के सवाल को खड़ा करता है।

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