वाराणसी [अजय कृष्ण श्रीवास्तव]। देश में जहां संस्कृत पढऩे वालों की संख्या में गिरावट आई है, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में विदेशियों में प्राच्य विद्या के गूढ़ रहस्यों को जानने की जिज्ञासा बढ़ रही है। इसका साक्षी है संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय।

वर्तमान में यहां रूस, ब्रिटेन, म्यांमार, नेपाल सहित विभिन्न देशों के छात्र भारतीय संस्कृति व संस्कृत को पढऩे व समझने में जुटे हुए हैं। विश्वविद्यालय में विदेशी ही नहीं मुस्लिम महिलाएं भी संस्कृत सीख रही हैं।

रूस की प्रो. ओल्गा फापेल्को को भारतीय दर्शन ने इस कदर प्रभावित किया कि वह संस्कृत पढऩे के लिए अपना देश छोड़कर भारत आ गईं। रशियन प्र्रेसिडेंसियल एकेडमी ऑफ नेशन, मास्को की असिस्टेंट प्रोफेसर रह चुकी प्रो. ओल्गा वर्तमान में विश्वविद्यालय से तीन वर्षीय संस्कृत पाठ्यक्रम में डिप्लोमा कर रही हैं। उन्होंने बताया कि वह 2003 में पहली बार भारत घुमने आई थीं। इसके बाद विभिन्न व्याख्यानों में भारत कई बार आना-जाना हुआ। धीरे-धीरे भारतीय संस्कृति व दर्शन से लगाव बढ़ता गया। अंतत: प्राच्य विद्या के गूढ़ रहस्यों को समझने के लिए संस्कृत विश्वविद्यालय में रजिस्ट्रेशन कराने का निर्णय लिया। संस्कृत पढऩे का मूल उद्देश्य सनातन धर्म का रूस में प्रचार करना है ताकि रूस के लोग भी भारतीय दर्शन व ज्योतिष के बारे में जान सकें।

रूस व भारत की सभ्यताओं में काफी समानताएं

प्रो. ओल्गा कहती हैं कि रूसी तथा भारतीय संस्कृति व सभ्यता में काफी समानता है। रसियन व संस्कृत के व्याकरण भी काफी हद तक मिलते हैं। इस प्रकार दोनों देशों में काफी समानता है।

दोनों देशों के बीच प्रगाढ़ता का भी शायद यही कारण है। उनका कहना है कि इन तमाम कारणों से भारतीय संस्कृति व संस्कृत को समझने की इच्छा हुई और संस्कृत पढऩे काशी आ गई ताकि अध्ययन करने के बाद रूस में संस्कृत का प्रचार-प्रसार कर सकूं।

मुस्लिम भी पीछे नहीं

आम तौर पर लोग संस्कृत को पंडितों की भाषा समझ लेते हैं। इस मिथक को तोड़ रही हैं मऊ की जेबा आफरीन। वह संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री कर रही हैं। उन्होंने आठवीं तक की शिक्षा मदरसा से हासिल की है। शास्त्री कर रही जेबा के परिवार वालों का संस्कृत से दूर-दूर तक नाता नहीं हैं। इसके बावजूद जेबा संस्कृत सीखने व समझने में जुटी हैं, ताकि मुस्लिम महिलाओं को संस्कृत के ज्ञान से परिचित कराया जा सके। 

Posted By: Dharmendra Pandey