अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस : टूट रही सदियों पुरानी रूढ़िवादी सोच, बेटियों को भी मिल रहा बराबर अपनापन
अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर वाराणसी में बेटों के बराबर बेटियों को गोद लिया गया, जो पुरानी रूढ़िवादी सोच में बदलाव ...और पढ़ें

वाराणसी में गोद लेने में बेटियों को मिली बेटों के बराबर प्राथमिकता।
HighLights
वाराणसी में 14 बालिकाओं और 14 बालकों को गोद लिया गया।
यह आंकड़ा बेटियों को अपनाने में बढ़ती समानता दर्शाता है।
देशभर में भी गोद ली गई बालिकाओं की संख्या अधिक है।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। कभी परिवार में बेटे की किलकारी को वंश आगे बढ़ने की खुशी माना जाता था तो बेटी के जन्म पर कई घरों में मायूसी छा जाती थी। लेकिन अब यह सोच धीरे-धीरे बदल रही है। परिवार पूरा करने के लिए बच्चा गोद लेने के फैसले में भी बेटियों को बराबर अपनाया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर वाराणसी से सामने आया आंकड़ा इसी बदलाव की कहानी कहता है।
यहां इस वर्ष 14 बालिकाओं और 14 बालकों को गोद लिया गया। यानी बेटी और बेटे को अपनाने का अनुपात 50-50 रहा। बेटियों को परिवार का हिस्सा बनाने की यह बराबरी उस रूढ़िवादी सोच को चुनौती देती है, जिसमें बेटे को प्राथमिकता दी जाती रही है। गोद लेने के मामलों में बालिकाओं की भागीदारी बताती है कि परिवार बनाने की इच्छा में बेटी और बेटे के बीच का अंतर कम हो रहा है।
देश में भी बालिकाओं की संख्या अधिक
केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (कारा) के आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025-26 में देशभर में 5,022 बच्चों को गोद लिया गया। इनमें 2,574 बालिकाएं और 2,448 बालक थे। इस तरह बालिकाओं की संख्या बालकों से 126 अधिक रही। वित्तीय वर्ष 2024-25 में भी 4,515 बच्चों को गोद लिया गया था, जिनमें 2,554 बालिकाएं और 1,961 बालक शामिल थे।
कानूनी प्रक्रिया से मिलता है परिवार
बच्चे को गोद लेने के लिए केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (कारा) के आधिकारिक पोर्टल पर पंजीकरण कराना होता है। इसके बाद भावी दत्तक माता-पिता की पात्रता, पारिवारिक स्थिति और बच्चे की देखभाल की क्षमता का आकलन किया जाता है। निर्धारित प्रक्रिया के तहत बच्चे का मिलान किया जाता है और आवश्यक कानूनी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद दत्तक ग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। इसका उद्देश्य बच्चे को सुरक्षित और स्थायी पारिवारिक वातावरण उपलब्ध कराना है। किसी बच्चे को सीधे गोद ले लेना इस कानूनी प्रक्रिया का विकल्प नहीं है।
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अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर वाराणसी का 14 बालिकाओं और 14 बालकों का आंकड़ा समानता की उम्मीद जगाता है। बेटियों को भी बराबर अपनाने का यह रुझान उस सोच में बदलाव का संकेत है, जिसमें कभी बेटे को ही परिवार की प्राथमिकता माना जाता था।
