वाराणसी, [रत्‍नाकर दीक्षित]। राजनीति में परिवारवाद आम कार्यकर्ताओं के मंसूबों पर हमेशा से पानी फेरता आया है। कार्यकर्ता जहां बांस-बल्ली लगाने व टाट बिछाने तक ही सीमित रह जाते हैं, वहीं परिवारवाद के सहारे नेताओं के पुत्र व परिजन सांसद विधायक बन जाते हैं। पूरे देश में परिवारवाद चरम पर है। कोई भी राजनीतिक दल ऐसा नहीं है जिसके नेता अपने परिजनों को आगे न बढ़ा रहे हों। मतलब साफ है इस कुप्रथा में सभी दल संलिप्त हैं। फिलहाल इससे पूर्वांचल भी अछूता नहीं है। आजमगढ़ और गाजीपुर व चंदौली संसदीय क्षेत्र ऐसे हैं जहां सर्वाधिक परिवारवाद को प्रश्रय मिलता है।

छोटू तिवारी एक पार्टी के बहुत ही समर्पित कार्यकर्ता हैं। पार्टी की ओर से कोई भी कार्यक्रम होता है तो उसकी सारी जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर होती है। मसलन बांस-बल्ली बांधना, दरी बिछाना, मंच तैयार करना, कुर्सी लगाना आदि। समर्पण इस हद तक कि पार्टी के जिला स्तरीय नेता भी आते हैं तो उछल-उछल कर जिंदाबाद-जिंदाबाद के नारे लगाते हैं। प्रधानी जिला पंचायती का चुनाव भी जीत चुके हैं। करीब तीन दशक से पार्टी की सेवा कर रहे हैं। अब वह आगे बढऩा चाहते हैं। खासकर विधायकी के टिकट की आस लगाए बैठे हैं। लेकिन जिले के एक कद्दावर नेता जब विधायक से सांसद बने तो विधायक की सीट से अपने भाई को लड़ा दिया। उनके भाई चुनाव हार गए। कारण स्पष्ट है छोटू जैसे समर्पित कार्यकर्ताओं की उपेक्षा जब-जब होगी तब-तब दलों की दुर्दशा भी होती रहेगी। ऐसा केवल छोटू के ही साथ नहीं है। बल्कि ऐसे तमाम समर्पित कार्यकर्ता हैं जो पूरा जीवन पार्टी को समर्पित कर देते हैं लेकिन, पार्टी का रवैया हमेशा उपेक्षात्मक ही होता है। ऐसे कार्यकर्ता परिवारवाद की बलि चढ़ जाते हैं। परिवारवाद पूर्वांचल के लगभग हर जिले और हर दल में है। 

सबसे पहले गाजीपुर जिले को लेते हैं। वहां अफजाल अंसारी लोस चुनाव में गठबंधन के प्रत्याशी हैं। जब-जब मौका मिला तो परिजन स्थापित होते गए। उनके भाई मुख्तार अंसारी जहां मऊ से विधायक हैं वहीं एक अन्य भाई शिगबतुल्लाह अंसारी मुहम्मदाबाद विधानसभा सीट से विधायक रह चुके हैं। 2017 के चुनाव में भाजपा की अलका राय ने इनको पटखनी दे दी थी। बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी के बेटे अब्बास अंसारी 2017 में घोसी से बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े। लेकिन, हार का सामना करना पड़ा था।

गाजीपुर जिले में ही रामकरन दादा  समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता थे। यह दो बार विधायक व दो बार विधान परिषद के लिए मनोनीत हुए। इनके पुत्र विजय यादव हैं, जो एमएलसी रह चुके हैं और अभी भी सपा के सक्रिय सदस्य हैं। वहीं दीनानाथ पांडेय बसपा के टिकट पर एक बार सैदपुर से विधायक निर्वाचित हुए। इनके पुत्र पेशे से इंजीनियर मनीष चंद्र पांडेय भी बसपा में सक्रिय हैं। 2017 में बसपा के ही टिकट पर जंगीपुर विधानसभा से चुनाव लड़े। लेकिन, हार गए।

जिले के कैलाश यादव समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता थे और मुलायम सिंह यादव सहित अखिलेश यादव के काफी करीबी थे। वह जमानियां और जंगीपुर विधानसभा सीट से सपा के टिकट पर दो बार विधायक चुने गए और दोनों बार प्रदेश सरकार में मंत्री रहे। इनके निधन के बाद जंगीपुर सीट पर हुए उपचुनाव में उनकी पत्नी किसमतिया देवी चुनाव लड़ीं और विधायक निर्वाचित हुईं। उसके बाद उनके पुत्र डा. वीरेंद्र यादव 2017 में जंगीपुर विधानसभा से सपा के विधायक चुने गए। इससे पहले वह ब्लाक प्रमुख व जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुके हैं। उधर, जगदीश कुशवाहा 1989 में जिले से निर्दल सांसद चुने गए। इनके पुत्र राजेश कुशवाहा सपा के सक्रिय सदस्य हैं। वह सपा के जिलाध्यक्ष भी रह चुके हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में सदर विधानसभा से चुनाव लड़े लेकिन, भाजपा की डा. संगीता बलवंत से हार गए।

बलिया में वर्तमान में नीरज शेखर भी वंशवाद की ही उपज हैं। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के निधन के बाद वह बलिया संसदीय सीट से चुनाव लड़े और जीत गए। लेकिन, 2014 के लोस चुनाव में वह भाजपा प्रत्याशी भरत सिंह से पराजित हो गए।

वर्तमान में आजमगढ़ सदर संसदीय सीट से सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव के पुत्र व सपा मुखिया अखिलेश यादव चुनाव लड़ रहे हैं। विरोधी इनके परिवार को परिवारवाद का पोषक होने का आरोप लगाते हैं। वर्तमान में इनके परिवार से करीब आधा दर्जन सदस्य चुनाव लड़ रहे हैं। इसके बाद नंबर आता है पूर्व मंत्री बलिराम यादव का। सपा सरकार में कई बार मंत्री रह चुके और इस समय पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव बलराम यादव यादव के पुत्र डा. संग्राम यादव इस समय अतरौलिया विधानसभा क्षेत्र से सपा विधायक हैं। यहीं के सपा के सदर विधायक व पूर्व मंत्री दुर्गा प्रसाद यादव भी अपने परिवार को राजनीति में आगे बढ़ाने में पूरी तरह तल्लीन हैं। उनके भतीजे प्रमोद यादव व प्रमोद यादव की पत्नी पल्हनी ब्लाक की पूर्व प्रमुख रह चुकीं हैं। विधायक के पुत्र विजय यादव मुहम्मदपुर के ब्लाक प्रमुख रह चुके हैं। जबकि वर्तमान में दुर्गाप्रसाद यादव के भाई के पौत्र पल्हनी ब्लाक के प्रमुख हैं।

कभी सपा सरकार में पर्यावरण मंत्री रहे स्व.रामप्यारे सिंह के पुत्र स्व. सर्वेेश सिंह सीपू सगड़ी विधानसभा क्षेत्र से सपा के विधायक रहे। जबकि 2012 के विधानसभा में सर्वेश सिंह सीपू सगड़ी और और उनके बड़े भाई टीपू सिंह बसपा के प्रत्याशी रहे। हालांकि दोनों भाइयों को हार का सामना करना पड़ा। पूर्व विधायक सीपू सिंह की हत्या के बाद वर्तमान में उनकी पत्नी वंदना सिंह सगड़ी विधानसभा क्षेत्र से बसपा से विधायक हैं। बसपा के ही पूर्व राज्यसभा सदस्य गांधी आजाद के पुत्र अरिमर्दन आजाद वर्तमान में लालगंज विधानसभा क्षेत्र से बसपा के विधायक हैं। अब इस लोकसभा के चुनाव में विधायक की पत्नी संगीता आजाद लालगंज संसदीय सीट से उम्मीदवार हैं। पूर्व सांसद रमाकांत यादव के पुत्र अरुण यादव एक बार सपा और वर्तमान में फूलपुर विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के विधायक हैं। मऊ जनपद से पूर्व  केंद्रीय मंत्री कल्पनाथ राय परिवार से उनके पुत्र सिद्धार्थ व पत्नी डा. सुधा, पुत्रवधू डा. सीता, बेटी डा. चंद्रलेखा राय भी चुनाव मैदान में बतौर उम्मीदवार उतर चुकी हैं।

इस लोकसभा चुनाव में जौनपुर संसदीय क्षेत्र से दो राजनीतिक घरानों का रसूख भी दांव पर है। भाजपा से जौनपुर लोकसभा क्षेत्र से मैदान में उतरे निवर्तमान सांसद डा. केपी सिंह जनसंघ से लगायत भाजपा तक बड़े नेताओं में शुमार रहे पूर्व मंत्री उमानाथ सिंह के पुत्र हैं। उनके पिता श्री सिंह जिले की तत्कालीन विधान सभा बयालसी से चार बार विधायक रहे। कल्याण सरकार में जेल मंत्री भी रहे। हांलाकि उनके निधन के करीब दो दशक के बाद केपी सिंह राजनीतिक फलक पर उभरे हैं।

यहां से कांग्रेस प्रत्याशी देवव्रत मिश्र भी राजनीतिक कुनबे से ताल्लुक रखते हैं। इनके पिता शिव प्रताप मिश्र न केवल कांग्रेस के सांसद रहे बल्कि नेहरू-गांधी परिवार के करीबी भी थे। इसके पहले भी देवव्रत मिश्र कांग्रेस से ही मछलीशहर क्षेत्र से भाग्य आजमा चुके हैं। ये पिता की सक्रिय राजनीति के दौरान ही कांग्रेस में सक्रिय हो गए थे।

चंदौली में सपा के पूर्व सांसद रामकिशुन यादव परिवारवाद की उपज हैं। इनका भी कुनबा अखिलेश यादव की तरह परिवारवाद का पोषक रहा है। इनके पिता स्व. गंजी प्रसाद 1974, 77 व 89 विधायक रहे। रामकिशुन को राजनीति विरासत में मिली है। पहले सपा से विधायक फिर सांसद बने। इनके भाई बाबूलाल 2017 में सपा के टिकट पर पीडीडीयू नगर में विधायकी लड़े लेकिन, हार गए। भतीजा मुलायम सिंह यादव और बेटा संतोष यादव जिला पंचायत सदस्य हैं।

वैसे जिले में सैयदराजा से विधायक सुशील सिंह भी वंशवाद से ही उपजे हैं। इन्हें वाराणसी परिक्षेत्र से  एमएलसी रहे अपने पिता उदयनाथ सिंह उर्फ चुलबुल से राजनीत विरासत में मिली है। तीन बार से अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों से विधायक हैं। इनके चाचा बृजेश सिंह वाराणसी क्षेत्र से एमएलसी हैं। 2012 में वह सैयदराजा विस क्षेत्र से चुनाव लड़े लेकिन, निर्दल प्रत्याशी मनोज सिंह से पराजित हो गए। विधायक सुशील सिंह की चाची अन्नपूर्णा सिंह भी एमएलसी रह चुकी हैं।

वाराणसी में पूर्व मंत्री सुरेंद्र पटेल व उनके भाई महेंद्र पटेल विधायक रह चुके हैं। उदयलाल मौर्या विधायक और भतीजे मधुकर जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुके हैं। उनके भाई अनिल घोरावल से भाजपा के विधायक हैं।

लोकसभा चुनाव 2014 के चुनाव में पूर्व सांसद अनुप्रिया पटेल गैर जनपद से आकर भाजपा व अपना दल एस के गठबंधन से चुनाव लड़ी और जीत भी गईं। अनुप्रिया पटेल को भी राजनीति पिता व अपना दल के संस्थापक सोनेलाल पटेल से विरासत के रूप में ही मिली है। इसके पूर्व अनुप्रिया रोहनिया से विधायक रह चुकी हैं। इनकी बहन पल्लवी पटेल के पति पंकज निरंजन फूलपुर से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में हैं। इनकी माता कृष्णा पटेल भी कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर गोंडा से किस्मत आजमा रही हैं।

सबसे पुराना औरंगाबाद हाउस

पूर्वांचल में परिवारवाद का सबसे पुराना उदाहरण वाराणसी का औरंगाबाद हाउस है। पंडित कमलापति त्रिपाठी के बाद उनके पुत्र लोकपति त्रिपाठी, बहू चंद्र त्रिपाठी क्रमश: विधायक व सांसद बने। लोकपति के पुत्र राजेशपति त्रिपाठी चंदौली से लोस का चुनाव लड़े लेकिन, सफल नहीं हुए। राजेश पति के पुत्र ललितेशपति त्रिपाठी मीरजापुर जिले के मडि़हान विस क्षेत्र से एकबार विधायक भी बने। फिलहाल वह कांग्रेस के टिकट पर मीरजापुर से लोस चुनाव लड़ रहे हैं।

Posted By: Vandana Singh