वाराणसी में पतंगबाजों के ‘फेस कोड’ से खुलता है प्रतिबंधित मांझे के गोदाम का ताला
वाराणसी में जानलेवा प्रतिबंधित मांझे की बिक्री चोरी-छिपे जारी है, जहां दुकानदार 'फेस कोड' के जरिए भरोसेमंद खरीदारों को गोदामों ...और पढ़ें

वाराणसी में 'फेस कोड' से खुलते हैं प्रतिबंधित मांझे के गोदाम, जानलेवा खेल जारी।
HighLights
वाराणसी में प्रतिबंधित मांझे की चोरी-छिपे बिक्री जारी।
'फेस कोड' के जरिए भरोसेमंद खरीदारों को मिलता है मांझा।
अत्यधिक मुनाफे के कारण जानलेवा मांझे का व्यापार फल-फूल रहा।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। जानलेवा मांझे की बिक्री पूरी तरह प्रतिबंधित है। बेचने वालों पर कार्रवाई हुई भी है और हो भी रही है। फिर भी यह बिक रहा है और लोगों की जान ले रहा है। बस अब बिक्री के तरीके बदल गए हैं। दुकानों पर केवल पतंग और सूती मांझा दिखता है लेकिन प्रतिबंधित मांझा से पतंग उड़ाने वालों के पहुंचते ही उनके ‘फेस कोड’ गोदामों का ताला खुल जाता है।
दुकानदार चेहरा पहचानते ही चोरी छिपे मांझा उपलब्ध करा देता है। सबसे ज्यादा प्रतिबंधित मांझे की बिक्री औरंगाबाद, दालमंडी, लोहता, चेतगंज, शिवपुर में होती है। औरंगाबाद तो इसका गढ़ है यह पुलिस भी मानती है। पतंग के पुराने कारोबारी ने बताया कि प्रतिबंधित मांझे के गोदाम औरंगाबाद में हैं। यहीं से पान, किराना और जनरल स्टोर चलाने वाले छोटे दुकानदार चोरी-छिपे बेचने के लिए खरीद लाते हैं।
हालांकि, दुकानदार अनजान खरीदार से दो टूक शब्दों में प्रतिबंधित मांझा रखने से मना कर देता है। मोहल्ले के लोग और बहुत ज्यादा विश्वास वाला चेहरा होने पर उसे बाद में या इंटरनेट पर काल करके बुलाया जाता है। फिर कागज में या किसी डिब्बे में छिपाकर मांझे की सप्लाई की जाती है। यही नहीं इसका पैसा पहले से भुगतान करना होता है।
सात सौ से एक हजार रुपये प्रति किलो है रेट
प्रतिबंधित मांझा 700 से 1000 रुपये प्रति किलो बेचा जाता है। सबसे ज्यादा महंगा मांझा गोल्ड ब्रांड का होता है। इसकी कीमत प्रति किलो एक हजार रुपये है। इसी प्रकार टुनटुन नाम से बिकने वाले मांझे का दाम प्रति किलो 950 रुपये है। आल आउट 850 रुपये, मोनो काइट 850 रुपये और हीरो 800 रुपये प्रति किलो बेचा जाता है।
लोकल में भी बना रहे हैं जानलेवा मांझा
प्रतिबंधित मांझे को लोकल में भी चोरी छिपे बनाया जाता है। सूती धागे पर लेड की एक परत चढ़ा दी जाती है जिससे यह जल्दी कटता नहीं है। वहीं कोलकाता और गुजरात के रास्ते भी प्रतिबंधित मांझे की खेप यहां आती है।
ज्यादा फायदे के कारण होती है बिक्री
आमतौर पर सूती मांझे 120 रुपये प्रति रील मिलता है लेकिन इसे धारदार बनाने के साथ ही इसकी कीमत में 200 से लेकर 300 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। यही वजह है कि प्रतिबंध, सजा और जुर्माना होने के बाद भी यह खेल चल रहा है।
