बनारस की अड़ियों की भट्टी में चाय ही नहीं भावनाएं भी मारती हैं 'उबालें'
बनारस की अड़ियाँ कभी सामाजिक संवाद और अनौपचारिक शिक्षा का केंद्र थीं, जहाँ लोग चाय के साथ हर विषय पर ...और पढ़ें

बनारस की अड़ियों पर चाय, चर्चा और बदलती सामाजिकता का नया अध्याय।
HighLights
अड़ियाँ सामाजिक संवाद और अनौपचारिक शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र थीं।
मोबाइल फोन के बढ़ते उपयोग ने व्यक्तिगत बातचीत को कम कर दिया है।
बनारस की अड़ियों पर अब भी चाय बनती है, पर माहौल बदला।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। बनारस की अड़ी की चाय की अपनी चाह है, तलब लगती है लिहाजा काशी सारी रात जगती है। कई अड़ियों में भट्टी की आंच मानो थमने को तैयार ही नहीं है। जमाने भर की चाय की च्यास संग भट्टी की आंच में जज्बात भी उबालें मारते दिखें तो समझिए वह काशी ही है या कहीं और नजर आए तो समझिए मिजाज बनारसी है, कुछ यही जायका मोहल्ला अस्सी फिल्म ने भी परोसा था। कुछ प्रमुख अड़ियों के बारे में भी आप जान लीजिए।
पप्पू की अड़ी - अस्सी-लंका रोड, अस्सी पर। सबसे मशहूर, पीएम नरेन्द्र मोदी भी यहीं चाय पी चुके हैं।
लक्ष्मी चाय वाले - चौक में। मक्खन-ब्रेड और चाय के लिए मशहूर।
नंदे की टी एंड काफी शाप - बंगाली टोला, केदारघाट से दशाश्वमेध जाने वाली गली में।
बहुत खराब चाय - रवींद्रपुरी में। नाम खराब, स्वाद लाजवाब।
शिवपुर बाजार में लालजी कुआं के पास झल्लू चाय
गोलू चाय की अड़ी - कैंटोनमेंट, पीसीएफ प्लाजा।
भट्टी की आंच अब भी वही है। सुबह की पहली रोशनी से पहले कोयले लाल होने लगते हैं और चाय की खुशबू के साथ अड़ी जाग उठती है। गुप्ता जी भी रोज की तरह अपनी जगह पर बैठे हैं। स्कूल के दिनों से यहां आते रहे हैं। करीब चार-पांच दशक में इस छोटी सी दुकान ने उन्हें सिर्फ चाय नहीं दी, दोस्त दिए, बहसें दीं और शहर को समझने का एक तरीका भी दिया।
आज बगल की बेंच खाली है। जिन लोगों के साथ कभी घंटों चर्चा होती थी, कोई दुनिया छोड़ गया तो कोई बच्चों के साथ शहर से दूर चला गया। सामने दो युवक आते हैं। चाय का गिलास हाथ में लेते हैं और दूसरे हाथ में फोन। कुछ ही देर में दोनों अपनी-अपनी स्क्रीन में खो जाते हैं। गुप्ता जी उन्हें देखते हैं और मुस्कुरा देते हैं। उन्हें अपना पोता याद आता है। फर्क बस इतना है कि पहले अड़ी पर चाय के साथ बातचीत होती थी, अब बातचीत भी फोन के भीतर होने लगी है।
अड़ी सिर्फ चाय की दुकान नहीं थी
बनारस की अड़ी दरअसल शहर की खुली पाठशाला रही है। यहां राजनीति से लेकर साहित्य, मोहल्ले की खबर से लेकर शहर की चिंता तक हर विषय पर बातचीत होती थी। बड़े-बुजुर्गों के साथ बैठकर नई पीढ़ी को शहर और समाज को देखने का नजरिया मिलता था। कोई अखबार पढ़ता, कोई अपनी राय रखता और कोई सिर्फ सुनता रहता। धीरे-धीरे अनजान लोग भी परिचित और फिर रिश्तों का हिस्सा बन जाते थे।
साथ बैठे, फिर भी दूर
आज अड़ी पर लोग अब भी बैठते हैं, चाय भी आती है, लेकिन बातचीत के बीच फोन आ गया है। पहले पांच लोग एक खबर पर अपनी-अपनी राय रखते थे, अब वही पांच लोग एक बेंच पर बैठकर अलग-अलग स्क्रीन देख सकते हैं। जानकारी बढ़ी है, मगर सामने बैठे व्यक्ति को जानने और समझने का समय घटा है।
अड़ी की अनौपचारिक शिक्षा
अड़ी में कोई शिक्षक नहीं था, फिर भी वहां व्यवहार, असहमति में संवाद, बुजुर्गों की बात सुनना और समाज को समझना सीखा जाता था। फोन तेजी से जानकारी देता है, लेकिन साथ बैठकर बातचीत करने की आदत नहीं सिखाता। यही फर्क पुरानी अड़ी और आज की बैठकी के बीच दिखाई देता है।
अड़ियां खत्म नहीं हुई हैं, उनका रूप बदला है। भट्टी अब भी जलती है, चाय अब भी बनती है। सवाल सिर्फ इतना है कि उसके सामने बैठकर एक-दूसरे के लिए समय निकालने वाले लोग कितने बचे हैं।
गुप्ता जी आखिरी प्याला खत्म करते हैं। अब वह बेटे के साथ शहर छोड़ रहे हैं। अड़ी पीछे रह जाएगी, लेकिन चार दशक की बैठकी की यादें साथ जाएंगी। शायद यही बनारस की अड़ी की सबसे बड़ी खूबी है जगह छोटी थी, लेकिन वहां बैठने वालों के लिए दुनिया बहुत बड़ी थी।
