IIT BHU ने विकसित की कचरे के प्लास्टिक से सड़क निर्माण की तकनीक, एनएच-44 पर बिछाई गई एक किमी लंबी दो लेन की रोड
आईआईटी (बीएचयू) के शोधकर्ताओं ने कचरे के प्लास्टिक को सड़क निर्माण सामग्री में बदलने की स्वदेशी और पेटेंटेड तकनीक विकसित ...और पढ़ें

आईआईटी बीएचयू ने कचरे के प्लास्टिक से बनाई टिकाऊ सड़क निर्माण तकनीक, एनएच-44 पर सफल प्रयोग। (AI Image)
HighLights
आईआईटी बीएचयू ने प्लास्टिक कचरे से सड़क तकनीक विकसित की।
एनएच-44 पर एक किमी प्रायोगिक सड़क का निर्माण किया गया।
यह पेटेंटेड तकनीक टिकाऊ सड़क निर्माण में सहायक है।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (काशी हिंदू विश्वविद्यालय), वाराणसी के शोधकर्ताओं ने कचरे के प्लास्टिक को सड़क निर्माण में उपयोगी सामग्री में बदलने की स्वदेशी तकनीक विकसित की है। इस तकनीक के माध्यम से प्रयोगशाला में हुए अनुसंधान को औद्योगिक स्तर पर उत्पादन और राष्ट्रीय राजमार्ग पर प्रायोगिक उपयोग तक पहुंचाया गया है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा वित्तपोषित अनुसंधान कार्यक्रम के तहत विकसित यह तकनीक पेटेंट भी प्राप्त कर चुकी है।
आईआईटी (बीएचयू) के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. अंकित गुप्ता एवं उनकी शोध टीम ने वेस्ट प्लास्टिक मॉडिफाइड बिटुमेन (W-PMB 76-10) तैयार करने के लिए वैज्ञानिक रूप से नियंत्रित वेट-प्रोसेस तकनीक विकसित की है। इसका उद्देश्य प्लास्टिक कचरे का उपयोग कर टिकाऊ और बेहतर प्रदर्शन वाली सड़क निर्माण सामग्री तैयार करना है।
इस तकनीक का महत्वपूर्ण मैदानी परीक्षण राष्ट्रीय राजमार्ग-44 के झांसी-ललितपुर खंड पर किया गया है। यहां लगभग एक किमी लंबी दो लेन की मुख्य सड़क का निर्माण प्रायोगिक तौर पर किया गया है, जो लगभग दो लेन-किमी के बराबर है। यह सड़क 24 सितंबर, 2026 को स्वच्छता पखवाड़ा के दौरान एनएच-44 (पुराना एनएच-26) के मुख्य कैरिजवे पर बिछाई गई। आधिकारिक परीक्षण विवरण के अनुसार, इस सड़क खंड को लगभग 70 मिलियन स्टैंडर्ड एक्सल के यातायात भार को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
इस निर्माण में लगभग 1,350 किलोग्राम अनुपयोगी एलडीपीई प्लास्टिक का इस्तेमाल किया गया है। सड़क पर वास्तविक यातायात और विभिन्न मौसमी परिस्थितियों में तकनीक के प्रदर्शन का आकलन किया जाएगा। इस तकनीक में सिंचाई के अनुपयोगी प्लास्टिक पाइप, पुरानी फाइलों और फोल्डरों सहित अन्य स्रोतों से प्राप्त एलडीपीई प्लास्टिक को पेलेट के रूप में तैयार कर बिटुमेन में मिलाया जाता है।
इसमें बिटुमेन के वजन के लगभग 3 से 4 प्रतिशत तक प्लास्टिक का उपयोग किया जाता है। पारंपरिक तकनीकों में जहां प्लास्टिक को मुख्य रूप से सड़क निर्माण में प्रयुक्त एग्रीगेट के साथ मिलाया जाता है, वहीं आईआईटी (बीएचयू) की वेट-प्रोसेस तकनीक में इसे सीधे बिटुमिनस बाइंडर में शामिल किया जाता है। इससे प्लास्टिक का अधिक नियंत्रित और समान मिश्रण तैयार करने में मदद मिलती है।
इससे तैयार संशोधित बिटुमेन का उद्देश्य अधिक तापमान और भारी वाहनों के दबाव में सड़क पर पड़ने वाले रटिंग (पहियों के निशान) तथा विकृति के प्रभाव को कम करना है। इसके वास्तविक प्रदर्शन का आकलन प्रायोगिक सड़क के नियमित परीक्षण से किया जाएगा।
इस अनुसंधान की एक प्रमुख उपलब्धि इसका प्रयोगशाला में तैयार किए गए फार्मूले से औद्योगिक स्तर पर उत्पादन तक पहुंचना है। मेसर्स एआर थर्मोसेट्स प्राइवेट लिमिटेड ने इस तकनीक को औद्योगिक स्तर पर विकसित करने और इसे सड़क निर्माण के लिए उपयोगी उत्पाद के रूप में तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आधिकारिक परीक्षण विवरण में आईआईटी (बीएचयू) को तकनीक का विकासकर्ता, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय को प्रायोजक तथा एआर थर्मोसेट्स प्राइवेट लिमिटेड को कार्यान्वयन एजेंसी के रूप में उल्लेखित किया गया है।
इस प्रकार तकनीक ने अनुसंधान, विकास, पेटेंट, औद्योगिक उत्पादन, सड़क पर प्रयोग और प्रदर्शन निगरानी के महत्वपूर्ण चरण पूरे किए हैं। आगे इसके व्यापक उपयोग की संभावनाओं का मूल्यांकन किया जाएगा।
आईआईटी (बीएचयू) के निदेशक प्रो. अमित पात्रा ने कहा कि इस तकनीक का सफल मैदानी प्रदर्शन संस्थान की उस प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिसके तहत उच्चस्तरीय अनुसंधान को वास्तविक जीवन की समस्याओं के समाधान में परिवर्तित किया जाता है।
उन्होंने कहा कि प्लास्टिक कचरे को सड़क निर्माण जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के लिए उपयोगी संसाधन में बदलना इस बात का उदाहरण है कि शैक्षणिक अनुसंधान, सरकारी सहयोग और उद्योग जगत की सहभागिता से स्वदेशी एवं टिकाऊ तकनीकी समाधान विकसित किए जा सकते हैं।
प्रो. अंकित गुप्ता ने कहा कि यह उपलब्धि मंत्रालय द्वारा वित्तपोषित अनुसंधान कार्यक्रम के अंतर्गत आईआईटी (बीएचयू) में किए गए निरंतर शोध का परिणाम है। प्रयोगशाला में विकसित तकनीक का औद्योगिक उत्पादन और अब राष्ट्रीय राजमार्ग पर प्रदर्शन तक पहुंचना उत्साहजनक है। एनएच-44 पर किया गया यह परीक्षण वास्तविक परिस्थितियों में तकनीक के प्रदर्शन से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े उपलब्ध कराएगा।
उन्होंने बताया कि उनके पीएचडी शोधार्थी डॉ. आकाश सिंह ने तकनीक के अनुसंधान और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अब इस तकनीक को उद्योग जगत के लिए अधिक स्वीकार्य बनाने के उद्देश्य से अतिरिक्त परीक्षण और मैदानी सत्यापन पर काम किया जा रहा है। प्रो. गुप्ता ने उद्योगों और अन्य संबंधित संस्थाओं से आगे आकर अतिरिक्त मैदानी परीक्षणों में भाग लेने की अपील की, ताकि विभिन्न यातायात एवं पर्यावरणीय परिस्थितियों में तकनीक की उपयोगिता का आकलन किया जा सके।
उन्होंने इस तकनीक को मैदानी स्तर तक पहुंचाने में सहयोग के लिए सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण और एआर थर्मोसेट्स प्राइवेट लिमिटेड के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने मंत्रालय के पूर्व एवं वर्तमान नेतृत्व तथा इसके एसएंडआर डिवीजन के मार्गदर्शन और सहयोग की सराहना की।
प्रायोगिक सड़क के निर्माण के बाद आईआईटी (बीएचयू) की शोध टीम इसके प्रदर्शन की नियमित निगरानी करेगी। इसके तहत सड़क की संरचनात्मक स्थिति, रटिंग, विकृति और अन्य महत्वपूर्ण इंजीनियरिंग मानकों का समय-समय पर अध्ययन किया जाएगा। इससे वास्तविक राजमार्ग यातायात और पर्यावरणीय परिस्थितियों में वेस्ट प्लास्टिक मॉडिफाइड बिटुमेन के व्यवहार, टिकाऊपन और उपयोगिता का आकलन किया जा सकेगा। यह परीक्षण स्वदेशी एवं पेटेंट प्राप्त तकनीक को अनुसंधान से व्यावहारिक बुनियादी ढांचा विकास तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
एनएच-44 पर किया गया यह प्रदर्शन आईआईटी (बीएचयू) की तकनीक के प्रयोगशाला अनुसंधान से औद्योगिक उत्पादन और मैदानी सत्यापन तक पहुंचने की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इस पहल में शैक्षणिक अनुसंधान, केंद्र सरकार, उद्योग जगत और राजमार्ग निर्माण से जुड़ी एजेंसियां मिलकर प्लास्टिक कचरे के उपयोग का एक टिकाऊ विकल्प विकसित करने की दिशा में काम कर रही हैं।
