आइआइटी बीएचयू से जुड़े स्टार्टअप एग्रीचिकित्सा के स्वदेशी तकनीक पर आधारित एग्रीस्टिक उपकरण को मिला पेटेंट
आईआईटी बीएचयू से जुड़े स्टार्टअप एग्रीचिकित्सा ने स्वदेशी तकनीक पर आधारित 'एग्रीस्टिक' उपकरण विकसित किया है, जिसे पेटेंट मिल गया ...और पढ़ें

आईआईटी बीएचयू के एग्रीस्टिक को मिला पेटेंट कृषि में लाएगा क्रांति।
HighLights
एग्रीचिकित्सा के स्वदेशी एग्रीस्टिक उपकरण को मिला पेटेंट।
कीट नियंत्रण, सिंचाई प्रबंधन और फसल सुरक्षा में सहायक।
कृषि लागत घटाकर किसानों की आय 30% तक बढ़ाएगा।
संग्राम सिंह, जागरण, वाराणसी। भारतीय कृषि अब पारंपरिक हल-बैल और अंदाजे के तरीकों से बाहर निकलकर डेटा और स्मार्ट तकनीक के नए दौर में कदम रख रही है। कीट, फसल की बीमारियां, अनियंत्रित सिंचाई और पक्षियों के हमले... किसानों की इन चार बड़ी चिंताओं का एक ही पक्का समाधान खोज लिया गया है।
आइआइटी बीएचयू के आइ-थ्री फाउंडेशन से जुड़े स्टार्टअप एग्रीचिकित्सा (फ्रेशनिक एग्रीबिजनेस प्राइवेट लिमिटेड) ने पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित एग्रीस्टिक उपकरण तैयार किया है। इस बहुउपयोगी आविष्कार को बीते 28 अगस्त को केंद्र सरकार के पेटेंट कार्यालय से पेटेंट भी हासिल हो चुका है। कागजों से निकलकर अब यह तकनीक सीधे खेतों में लहलहाती फसलों की चौकीदारी कर रही है।
एग्रीस्टिक एक 'आल-इन-वन' इंटरनेट आफ थिंग्स आधारित कृषि उपकरण है, जो खेत में एक साथ कई मोर्चों पर काम करता है। रात के हानिकारक कीटों को फंसाने के लिए यूवी लाइट ट्रैप, दिन के लिए येलो पैन ट्रैप, डाइक्रोमैटिक येलो स्टिकी ट्रैप और फेरोमोन ट्रैप एकीकृत हैं। इसमें लगे लीफ वेटनेस सेंसर (पत्तियों की नमी) और साइल माइस्चर सेंसर (मिट्टी की नमी) खेत के हालात का रियल-टाइम डेटा सर्वर तक भेजते हैं, जिससे बेवजह सिंचाई से मुक्ति मिलती है।
फसलों को परिंदों के नुकसान से बचाने के लिए इसमें बर्ड डिटरेंस सिस्टम लगाया गया है। यह पूरी तरह सोलर पैनल और रीचार्ज करने योग्य बैटरी पर चलता है। लगातार बादल रहने या धूप नहीं खिलने पर भी इसकी बैटरी आठ से 10 दिनों तक बिना रुके काम कर सकती है। इस उपकरण में टाइमर-आधारित लाइट कंट्रोल सिस्टम है।
पूरी रात लाइट नहीं जलाकर सिर्फ तय समय पर चलाने से फसलों को फायदा पहुंचाने वाले मित्र कीट सुरक्षित रहते हैं। एक 'एग्रीस्टिक' उपकरण एक एकड़ (0.4 हेक्टेयर) खेत के लिए पर्याप्त है। इसके इस्तेमाल से कृषि लागत में भारी गिरावट और उत्पादन में सुधार दर्ज किया गया है। कीटनाशकों, अनावश्यक सिंचाई और संसाधनों के संतुलित इस्तेमाल से खेती का खर्च आधा तक कम हो जाएगा।
फसल का नुकसान रुकने और सटीक प्रबंधन मिलने से किसानों की शुद्ध आय में 30 प्रतिशत तक सुधार संभव है। वर्तमान में सीमित उत्पादन के कारण इसकी लागत 35 हजार रुपये है, लेकिन बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू होते ही इसकी कीमत काफी कम हो जाएगी। साथ ही, एकीकृत कीट प्रबंधन के तहत विभिन्न सरकारी योजनाओं में इसके ट्रैप्स पर 75 प्रतिशत तक सब्सिडी का प्रविधान है।
यह नवाचार सिर्फ प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है। पिछले तीन महीनों से बनारस के टिकरी गांव में एफपीओ अध्यक्ष अमित सिंह और सचिव डा. रामकुमार राय के सहयोग से इसका खेतों में सफल परीक्षण चल रहा है। इस खास नवाचार को बनारस निवासी और एग्रीचिकित्सा के संस्थापक व सीईओ हेमंत सिंह और आइओटी इंजीनियर आशीष चौधरी के नेतृत्व में विकसित किया गया है।
उन्होंने मैकेनिकल डिजाइन, सेंसर ट्रैकिंग और पेस्ट कंट्रोल को एक ही प्लेटफार्म पर ला खड़ा किया। प्रोजेक्ट में आइआइटी बीएचयू में मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. रजनीश त्यागी और इलेक्ट्रानिक्स इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. मनोज कुमार मेश्राम का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ है।
अगले तीन माह में बाजार में उपलब्ध कराने की तैयारी
हेमंत कहते हैं कि वर्तमान में एग्रीस्टिक को नाबार्ड की प्रसिद्ध संस्था बैंकर इंस्टीट्यूट आफ रूरल डेवलपमेंट (बर्ड) लखनऊ में स्थापित किया जा चुका है, जहां देशभर से आने वाले किसानों को इसका प्रशिक्षण दिया जाएगा। अगले तीन माह में इसे किसानों के लिए व्यापक रूप से बाजार में उपलब्ध कराने की तैयारी चल रही है। प्रदेश के वाराणसी, लखनऊ, मीरजापुर, सोनभद्र, गाजीपुर, सहारनपुर और मुजफ्फरनगर समेत कई जिलों में इसका दायरा बढ़ाया जा रहा है।
