वाराणसी, जागरण संवाददाता। ज्ञानवापी में मिले शिवलिंगाकार आकृति पर दिए गए बयान से उपजे विवाद से व्यथित काशी करवत मंदिर के वयोवृद्ध महंत पं. गणेश शंकर उपाध्याय ने एक चौंकाने वाले घटनाक्रम में में अपनी गद्दी त्याग दी। उन्होंने अपने छोटे भाई डा. दिनेश अंबाशंकर उपाध्याय को गद्दी सौंपते हुए स्वयं के लिए प्रायश्चित का मार्ग चुना है। रविवार को मंदिर परिसर में बुलाई गई प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने यह घोषणा की। इस अवसर पर उपस्थित काशी विश्वनाथ मंदिर महंत परिवार के वरिष्ठ डा. कुलपति तिवारी ने नए महंत को माल्यार्पण कर व पगड़ी पहनाकर उन्हें गद्दी पर बैठाया।

पूर्व महंत कहा कि मेरी जीवनचर्या कभी भी धर्म से इतर न रही। छल-छद्मयुक्त राजनीति जैसे विषय में मेरी भिज्ञता सदैव शून्य से कम रही। यही कारण रहा कि मैं आसानी से शिकार हुआ। इससे उपजे विवाद ने मुझे अत्यंत विचलित कर दिया है। ये नौ दिन मैंने अत्यंत पीड़ा में काटे हैं। इस संपूर्ण घटनाक्रम पर मैं किसी को भी दोषी नहीं मानता। यह सब दैवीय विधान मानकर भीमेश्वर प्रभु को न्याय हेतु मुखापेक्षी हूं। उनकी न्याय व्यवस्था संसार में सर्वाेच्च है। मेरा उन पर अटूट विश्वास है। कहा कि वर्तमान में उपजे इस विवाद से सनातनी हिंदुओं का ऐक्य प्रभावित हुआ। समाज दो वर्गों में बंट गया। किसी समाज की दुर्बलता या सबलता उसकी एकता पर घात करने से प्रभावित होती है। इस सामाजिक क्षति से मेरा स्वभावगत क्षरण हुआ है और मानसिक वेदना का आघात हुआ है। इसलिए महंत पद को उसी गरिमा, मर्यादा और निर्बाध परंपरा के रक्षणार्थ त्याग रहा हूं।

क्या था मामला : गत दिनों एक निजी चैनल ने वयाेवृद्ध महंत से ज्ञानवापी मस्जिद के तहखाने में मिले शिवलिंगाकार आकृति के विषय में प्रश्न किया था। इस पर महंत ने उत्तर में कहा था कि मैं बचपन में खेलते हुए उधर जाता था तो उसे देखता था। मैंने मस्जिद के मौलाना से पूछा था कि वह क्या है, तो उन्होंने बताया कि वह फव्वारा है। बालपन से मैंने उसे उसी रूप में जाना था। हालांकि, कभी उस फव्वारे को चलते हुए नहीं देखा था। उनके इस बयान के बाद इंटरनेट मीडिया पर अनेक तरह की टिप्पणियां सामने आने लगी थीं।

Edited By: Abhishek Sharma