बनारस का इतिहास कोहरे में लिपटी उस सुबह बदल गया था, राजपाट से लोकतंत्र की ओर इस तरह बढ़ी काशी
15 अक्टूबर 1949 को बनारस रियासत का प्रशासन संयुक्त प्रांत सरकार को सौंप दिया गया, जो राजशाही के अंत और ...और पढ़ें
HighLights
15 अक्टूबर 1949 को बनारस रियासत का विलय हुआ।
राजशाही समाप्त होकर लोकतंत्र की नई व्यवस्था शुरू हुई।
काशी ने अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखा।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। रामबाग से रामनगर किले की ओर बढ़ते हुए वह सुबह सामान्य दिनों जैसी ही थी। ठंड थी और कोहरे की चादर अभी पूरी तरह हटी नहीं थी। किले से करीब सौ मीटर पहले अचानक भीड़ दिखाई दी। पिता के चेहरे पर गंभीरता थी और उनके कदम तेज हो गए।
कुछ ही मिनट में हम भी भीड़ के साथ किले के दरवाजे पर खड़े थे। सब कुछ परिचित था, लेकिन लोगों की बेचैनी बता रही थी कि कुछ महत्वपूर्ण हुआ है। रामनगर निवासी 85 वर्षीय पंडित द्वारकानाथ त्रिपाठी उस सुबह की स्मृतियां साझा करते हुए बताते हैं कि किले के पास पहुंचने पर वहां भीड़ जुटी थी।
पिता के चेहरे की गंभीरता और लोगों की बेचैनी से उन्हें किसी बड़े बदलाव का एहसास हुआ। पता चला कि यह वही दिन था, जब बनारस रियासत का प्रशासन नई शासन व्यवस्था के अधीन चला गया।

राजसत्ता के अंत साथ शुरू हुआ लोकतंत्र का राज
यह 15 अक्टूबर 1949 की सुबह थी। बनारस के इतिहास में वह दिन, जब राजसत्ता के एक लंबे अध्याय का समापन हुआ और रियासत का प्रशासन संयुक्त प्रांत सरकार को सौंप दिया गया। स्वतंत्र भारत में रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया के बीच काशी भी नए दौर में प्रवेश कर गई थी।
राजपाट से आगे भी रही काशी नरेश की भूमिका
बनारस का इतिहास केवल राजाओं और उनके शासन का इतिहास नहीं है। यह उस शहर की कहानी भी है, जिसने बदलती राजनीतिक व्यवस्थाओं के बीच अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखी। मनसा राम और बलवंत सिंह के दौर से शुरू हुई राजपरिवार की राजनीतिक यात्रा चेत सिंह और बाद के शासकों से होती हुई डा. विभूति नारायण सिंह तक पहुंची। इस दौरान काशी ने कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखे।
विलय के बाद राजपरिवार की शासन संबंधी भूमिका समाप्त हो गई, लेकिन धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से उसका जुड़ाव बना रहा। डा. विभूति नारायण सिंह रामनगर की रामलीला और काशी के अन्य प्रमुख आयोजनों से जुड़े रहे। 2000 के बाद से उनके पुत्र कुंवर अनंत नारायण सिंह काशी की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करते हुए इसे आगे बढ़ा रहे हैं।

तारीख बदली, काशी की जीवंतता बनी रही
रामनगर का किला आज भी बनारस के इतिहास की अनेक परतों का साक्षी है। उसकी पहचान राजपरिवार के इतिहास के साथ-साथ रामनगर की रामलीला जैसी परंपराओं से भी जुड़ी है। 15 अक्टूबर 1949 का परिवर्तन इसी लंबे सफर का महत्वपूर्ण पड़ाव था।
शासन व्यवस्था बदली, राजसत्ता का स्वरूप बदला, लेकिन काशी की सांस्कृतिक चेतना और परंपराओं से उसका जुड़ाव बना रहा। उस दिन बनारस ने स्वतंत्र भारत की नई व्यवस्था में अपनी जगह बनाई। राजपाट का अध्याय समाप्त हुआ, मगर काशी की ऐतिहासिक विरासत और सांस्कृतिक जीवन आगे बढ़ते रहे।
तारीखों में दर्ज हो गया काशी के राजतंत्र का इतिहास
- भारत सरकार की 1950 की पुस्तक भारतीय रियासतों पर श्वेत पत्र में बनारस रियासत के विलय और प्रशासन सौंपने का विवरण है।
- 5 सितंबर 1949 को बनारस के महाराजा और भारत सरकार के बीच समझौता हुआ। इसमें 15 अक्टूबर 1949 को प्रशासन सौंपने की तारीख तय की गई थी।
- समझौते के अनुसार, 15 अक्टूबर 1949 को बनारस रियासत का प्रशासन संयुक्त प्रांत सरकार ने संभाल लिया।
- 29 नवंबर 1949 को रियासतों के विलय से जुड़ा सरकारी आदेश जारी हुआ, जिससे उनके प्रशासन को नई व्यवस्था में शामिल करने का रास्ता साफ हुआ।
