अजय कृष्ण श्रीवास्तव, वाराणसी :

संपूर्णानंद संस्कृत विवि परिसर में स्थित ऐतिहासिक 'अशोक स्तंभ' के दरकने से इसके अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। इसके अलावा स्तंभ के चबूतरे में लगे पाइप भी गायब होने लगे हैं। स्तंभ 9.15 मीटर ऊंचे पत्थर का लाट है, जो काफी सलीके से तराशा गया है। इस स्तंभ को स्थापित करने के लिए एक भव्य चबूतरा भी बनाया गया है। जिसे लोहे की पाइप से घेरा गया है। रखरखाव के अभाव में जहां पत्थर का क्षरण हो रहा है, वहीं चबूतरे में लगे पाइप अब गायब होने लगे हैं। जबकि ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए पुरातत्व विभाग ने इसे अपने अधीन लेकर राष्ट्रीय महत्व का स्तंभ घोषित किया है। हालांकि संरक्षण के नाम पर पुरातात्विक विभाग ने सिर्फ बोर्ड लगा रखा है। राष्ट्रीय महत्व का होने के बावजूद यह उपेक्षा का शिकार बना है। स्तंभ के आसपास गंदगी फैली हुई है। साफ-सफाई की कोई व्यवस्था नहीं है।

-गाजीपुर से लाया गया विश्वविद्यालय

बलुआ पत्थर से निर्मित स्तंभ गाजीपुर जिले के प्रहलादपुर नामक स्थान से लाकर विश्वविद्यालय के क्रीड़ा प्रागंण के गेट पर स्थापित किया गया था। उत्तर-पूर्व राज्य के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर जेम्स थॉमसन के आदेश पर वर्ष 1853 में स्तंभ वाराणसी आया था। बंगाल के तत्कालीन लेफ्टिनेंट अभियंता जार्ज फ्रैंकलिन एटकिन्सन द्वारा मई 1854 में इसे खड़ा किया गया। इस स्तंभ में दो उत्कीर्ण लेख हैं। प्रथम लेख गुप्तकालीन शिशुपाल का व द्वितीय लेख शंख लिपि में छठवीं शताब्दी का है।

- 200 मीटर दायरे में निर्माण पर रोक

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण पटना ने स्तंभ को संरक्षित करने के लिए अपना बोर्ड भी लगा रखा है। प्राचीन स्मारक, पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम 1958 के अधीन पुरातत्व विभाग ने स्तंभ को राष्ट्रीय महत्व का घोषित किया है। संरक्षित सीमा का 200 मीटर दायरा निषिद्ध व विनियमित क्षेत्र घोषित है। जिससे 200 मीटर दायरे में निर्माण प्रतिबंधित है। इस स्तंभ को हानि पहुंचाने पर तीन माह की कैद या 5000 रुपये अर्थदंड अथवा दोनों हो सकता है।

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कोट

अशोक स्तंभ पुरातत्व विभाग के अधीन है। ऐसे में इसकी मरम्मत विश्वविद्यालय नहीं करा सकता। स्तंभ संरक्षित रखने के लिए विवि प्रशासन ने पुरातत्व विभाग को पत्र लिखा है, ताकि ऐतिहासिक मुख्य भवन की भांति लाट का भी जीर्णोद्धार हो सके।

- नवीन कुमार शर्मा, संपत्ति अधिकारी

Posted By: Jagran

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