वाराणसी [प्रमोद यादव]। सनातन धर्म के पंच देवताओं में प्रमुख व प्रथम पूज्य भगवान गणेश का जन्म भाद्र शुक्ल चतुर्थी को मध्याह्न में जन्म हुआ था। इस तिथि को वैनायिकी वरद् श्रीगणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। इस बार यह व्रत पर्व 13 सितंबर को मनाया जाएगा।

चतुर्थी तिथि 12 सितंबर को शाम 6.38 बजे लग रही है जो 13 सितंबर को शाम 5.47 बजे तक रहेगी। विघ्न विनाशक प्रभु श्रीगणेश के इस जन्मोत्सव व्रत पर्व को महाराष्ट्र में सिद्धि विनायक व तमिलनाडु में विनायक चतुर्थी तो बंगाल में सौभाग्य चतुर्थी रूप में मनाते हैं। ख्यात ज्योतिषाचार्य पं. ऋषि द्विवेदी के अनुसार प्रख्यात ज्योतिषाचार्य पं. ऋषि द्विवेदी के अनुसार इस दिन विघ्न विनाशक की कृपा प्राप्ति के लिए सविधि भगवान गणेश के निमित्त स्नान-दान-उपवास और पूजन, अर्चन-वंदन जो भी किया जाता है, वह गणपति कृपा से सहस्त्रगुणा हो जाता है।

इससे जीवन के सभी तरह के विघ्न शांत हो कर सुखद जीवन का मार्ग प्रशस्त होता है और सभी तरह के पाप नष्ट हो जाते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने बताई थी महत्ता- महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को इसका महत्व बताया था। इसके प्रभाव से पांडवों ने कौरवों पर विजय प्राप्त की। इस दिन से सात, नौ या दस दिनी जन्मोत्सव भी मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इसकी खूब धूम होती है। देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में भी इसकी रंगत साल-दर-साल निखरती जा रही है। मोदक-दुर्वा का लगाएं भोग - तिथि विशेष पर प्रात: स्नानादि कर 'जन्म जन्मांतर तक पुत्र-पौत्र व धन, जय, यश, ऐश्वर्य, प्रभुत्व सभी की अभिवृद्धि के लिए व्रत रहूंगी या रहूंगा।' के साथ व्रत संकल्प लेना चाहिए।

गणेश प्रतिमा स्थापना कर मंत्रोच्चार, ध्यान, आवाहन, आशन, पाद्य, अ‌र्घ्य, आचमन, पंचामृत स्नान, वस्त्र भूषण, यज्ञोपवीत, सिंदूर आदि से पूजा करना चाहिए। लड्डू, ऋतु फल, दुर्वा आदि नैवेद्य मंत्र संग अर्पित करना चाहिए। ढेला चौथ 12 को, चंद्र दर्शन निषेध - भाद्र शुक्ल चतुर्थी को ढेला चौथ भी कहते हैं लेकिन इस बार ढेला चौथ 12 सितंबर को होगी। शास्त्र अनुसार जिस दिन चंद्राश में चतुर्थी मिल रही हो या तृतीया युक्त चतुर्थी में चंद्राश हो तो उसी दिन ढेला चौथ होती है।

चतुर्थी का चांद 12 सितंबर की रात दिखने से ढेला चौथ इसी दिन मनाया जाएगा। ऋषि पराशर ने चौथ का चंद्रमा देखने का दोष बताया है। कहा है कि शुक्ल पक्ष की चौथ का चांद देखने से मिथ्या दोष (कलंक) लगता है। जिसमें चंद्रांश रात 8.06 बजे हो रहा है। आवश्यकता पर इस समय के बाद ही आकाश की ओर देखना चाहिए। अनजाने में चंद्र दर्शन पर शास्त्रों ने परिहार बताया है। विष्णु पुराण में दोष शांति मंत्र 'सिंह प्रसेन मनोवधित सिंहो जाम्बवत:, अत: सुकुमार कुमारो दीशव हेत स्मंतक:।' वर्णित है। इसके अलावा स्मंतक मणि की कथा सुननी चाहिए। लोक में परिहारार्थ पड़ोसी के घर पर कंकड़ फेंकने से भी कलंक मुक्ति का प्रचलन है।