वाराणसी, जागरण संवाददाता। सनातन धर्म में भाद्र कृष्ण चतुर्थी अर्थात संकष्ठी (बहुला) श्रीगणेश चतुर्थी का विशेष स्थान है। शास्त्र के अनुसार इस व्रत को उसी चतुर्थी में करना चाहिए जो चंद्रमा के उदय में व्याप्त हो। क्योंकि संकष्ठी चतुर्थी की व्रत कथा में भाद्र कृष्ण चौथ को चंद्रमा का उदय होने पर विघ्न विनाशक प्रथम पूज्य गणेश जी के साथ चंद्र पूजन और अर्घ्य देने का विधान है।

इस बार गणेश चतुर्थी व्रत 15 अगस्त को पड़ रहा है। चतुर्थी तिथि 14-15 की मध्य रात्रि के बाद 1.47 बजे के बाद लग रही है जो 15-16 की मध्य रात्रि 12.40 बजे तक है। चंद्रोदय 15 अगस्त की रात 9.04 बजे होगा। इस दिन प्रातः व्रतीजनों को नित्य क्रिया से निवृत्त हो स्नान कर सर्व प्रथम हाथ में जल अक्षत पुष्प लेकर संकल्प करना चाहिए। संकल्प में अपने नाम सहित मास, तिथि, वार, पक्ष का उच्चारण कर पुत्र-पौत्र, धन, ऐश्वर्य तथा सभी प्रकार के कष्टों से निवृत्ति के लिए मैं गणेश चतुर्थी का व्रत करूंगा या करूंगी संकल्प लेकर गणेश पूजन पंचोपचार या षोडशोपचार कर दिन भर व्रत रहें।

रात में चंद्रोदय के समय गणेश जी का विधिवत पूजन के साथ ही चंद्रमा कै पूजन कर भगवान गणेश को नैवेद्य में लड्डू, दूब, काला तिल, गुड़, ऋतु फल आदि समर्पित करें। इसके बाद रात में चंद्रोदय होने पर यथा विधि चंद्र देव को क्षीर सागर मंत्रों के द्वारा अर्घ्य दान करना चाहिए। यथा विधि पूजन करें। क्षीर मंत्र का अर्थ है कि क्षीर समुद्र से उत्पन्न है। सुधा रूप है। निशाकर आप रोहिणी सहित मेरे दिए हुए भगवान गणेश के प्रेम को बढ़ाने वाले अर्घ्य को ग्रहण करें। रोहिणी सहित चंद्रमा के लिए वंदन है। एेसा करने से व्रतियों के सभी तरह की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। पुत्र-पौत्रादि दीर्घायु के साथ ही चतुर्दिक सुख का प्राप्ति होती है।

Edited By: Saurabh Chakravarty