भारत में ब्राह्मण से लेकर दलित तक सबके पूर्वज एक, डीएनए रिसर्च में साबित : प्रो. ज्ञानेश्वर
प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने हार्वर्ड की 'एएनआई-एएसआई' थ्योरी को अंग्रेजों के नस्लीय षड्यंत्र का नया रूप बताया, कहा कि यह ...और पढ़ें

डीएनए रिसर्च से खुलासा: हार्वर्ड की 'एएनआई-एएसआई' थ्योरी नस्लीय षड्यंत्र, सभी भारतीयों के पूर्वज एक। (AI Image)
HighLights
हार्वर्ड की 'एएनआई-एएसआई' थ्योरी नस्लीय षड्यंत्र का नया रूप।
डीएनए शोध से सिद्ध, सभी भारतीयों के पूर्वज एक हैं।
भारतीय उपमहाद्वीप में आनुवंशिक इतिहास की अटूट निरंतरता।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। सदियों से भारतीयों को उत्तर और दक्षिण या ''आर्य और द्रविड़'' के नाम पर बांटने वाली पश्चिमी थ्योरी पूरी तरह से भ्रामक है।
हार्वर्ड विश्वविद्यालय द्वारा प्रचारित ''एएनआइ'' (ऐन्सेस्ट्रल नार्थ इंडियन) और ''एएसआइ'' (ऐन्सेस्ट्रल साउथ इंडियन) थ्योरी असल में कभी भारत मे अस्तित्व में थी ही नहीं, यह एक कंप्युटर कन्स्ट्रक्ट है। भारत में ब्राह्मण से लेकर दलित तक सबके पूर्वज एक हैं। डीएनए शोध मेें यह सिद्ध हो चुका है।
यह सिर्फ अंग्रेजों की पुरानी ''रेसियल थ्योरी'' (नस्लीय सिद्धांत) को एक नई चाशनी में लपेटकर परोसने की कोशिश है। यह बातें काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ख्यात जीन विज्ञानी प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने कही।
वह शुक्रवार को बीएचयू के महिला महाविद्यालय के ''प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व'' विभाग के तत्वावधान में आयोजित 'भारतीय उपमहाद्वीप की सदियों पुरानी थ्योरीज को डीएनए रिसर्च कैसे बदल रहा है' विषयक व्याख्यान में बोल रहे थे।
उन्होंने कहा कि भारत के लोगों को कृत्रिम खांचे (एएनआइ-एएसआइ) में बांटना हावर्ड की एक सोची-समझी साजिश है, जिसका उद्देश्य समाज में विभाजन पैदा करना है। हजारों डीएनए सैंपल के अध्ययन से पता चला कि आनुवंशिक रूप से ऐसी कोई भी दो अलग-अलग नस्लें भारत में कभी नहीं रहीं।
पुरातात्विक कंकालों के डीएनए अध्ययन ने यह साबित कर दिया है कि भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों का आनुवंशिक इतिहास एक अटूट निरंतरता वाला है। इसमें बाहर से आकर किसी नस्ल के हावी होने की बात पूरी तरह निराधार है। प्रो. चौबे ने वाई-क्रोमोजोम और ''हैपलोग्रुप आर-2'' का वैज्ञानिक डेटा प्रस्तुत कर जातियों की दीवार को डीएनए के आधार पर ढहा दिया।
बताया कि डीएनए साक्ष्यों के अनुसार, एक ब्राह्मण और एक क्षत्रिय के पूर्वज आज से लगभग 2,000 साल पहले एक ही व्यक्ति थे। इन लोगों का गुजरात के पटेल समुदाय के साथ आनुवंशिक जुड़ाव लगभग 4,500 साल पुराना पाया गया है। प्राचीन संथाल जनजाति के साथ यह आनुवंशिक और डीएनए कनेक्शन 8,000 साल पुराना है।
जैविक और आनुवंशिक स्तर पर संपूर्ण भारत एक है। व्याख्यान में डा. विवेकानंद उपाध्याय, डा. मनीष मीना, डा. ऊषा रानी, डा. जोस टाम राफेल आदि थे। मुख्य वक्ता का स्वागत प्रधानाचार्य प्रो. रीता सिंह ने किया।
