वाराणसी [संजय यादव] । कुष्ठ का दंश ऐसा कि अपना खून भी मुंह मोड़ ले, समाज नाता तोड़ ले और रोगी खुद का अस्तित्व खो दे लेकिन यहां तो रोगियों के संबल बने एक संत। इन्होंने कुष्ठ रोगियों को रोगमुक्त कर समाज में समानता का अधिकार दिलाने का कठिन, बेहद कठिन संकल्प लिया।

हम बात कर रहे हैं रामनगर पड़ाव स्थित सर्वेश्वरी समूह और संस्थापक अवधूत भगवान राम की। यहां से ही शुरू हुआ कुष्ठ रोगियों की सेवा का मिशन। सितंबर 1961 को इसे पड़ाव पर संगठित रूप दिया गया। हालांकि उन्होंने सबसे पहले मंडुआडीह स्थित सुलेमान के बगीचे में कुष्ठ रोगियों की सेवा के लिए सर्वेश्वरी समूह की स्थापना की और यहां से ही शुरू हुई कुष्ठ रोगियों की सेवा। सर्वाधिक पीडि़त क्षेत्र पड़ाव पर ध्यान केंद्रित करते हुए मात्र 10 रुपये की पूंजी से  अस्पताल का शुभारंभ हुआ। शिलान्यास समारोह के आयोजन में सात रुपये खर्च हो गए। पहली ईंट भक्त रामलखन ने रखी थी और धीरे- धीरे साधन जुटते गए। 1961 में उपचार शुरू हुआ।

बाद में 50 शैय्या पुरुष अंतरंग कक्ष का उद्घाटन तत्कालीन उपप्रधानमंत्री बाबू जगजीवन राम ने 1962 में किया। तत्पश्चात 1964 में 10 शैय्या वाला महिला वार्ड का उद्घाटन मोरारजी देसाई ने किया। खुद अपने हाथों आयुर्वेदिक औषधि बनाते और चमत्कारी रूप से पीडि़तों के जख्म, दवा-दुआ से भर जाते। शिष्यों को गुरु मंत्र के रूप में सेवा का संकल्प ही मिला।

पड़ाव स्थित अघोर पीठ में नशा समेत अवगुणों व मन में घर कर चुकी कुरीतियों की पोटली दीक्षा से पहले गुरु चरणों में अर्पित की जाती है। यह इस परंपरा से जुडऩे की पहली शर्त भी है। कुष्ठ रोगियों की सेवा के लिए पहचानी जाने वाली संस्था में अब तक कई रोगियों को स्वस्थ कर लिया गया है। वर्तमान में इस अस्पताल में कुल 60 शैय्या रोगियों के लिए उपलब्ध हैं।

गिनीज व लिम्का बुक में दर्ज : 1990 तक कुल 2,46,548 रोगियों का इलाज कर उन्हें स्वस्थ किया गया। इसमें 99 हजार पूरी तरह से तो 1,47,503 आंशिक रूप से कुष्ठ से ग्रसित थे। इसका आंकड़ा गिनीज बुक और लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में भी दर्ज किया गया। संस्था का मान सम्मान देश ही नहीं, विश्व स्तर पर बना हुआ है।

होता है आयुर्वेदिक इलाज : कुष्ठ रोगियों का सेवा भाव से इलाज किया जाता है जो पूरी तरह आयुर्वेदिक व फकीरा पद्धति से होता है। -पीठाधीश्वर बाबा गुरुपद संभव राम जी महाराज।

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