वाराणसी [प्रमोद यादव]। रोज कुआं खोदने और पानी पीने वाली आबादी जिसके लिए एक दिन काम न मिला तो पेट खाली जैसी स्थिति हो भगवान न करे कोई दुर्घटना बीमारी आ जाए तो बड़ा सवाल यह कि पहले परिवार के लिए रोटी ले आए या दवा कराए। ऐसी ही स्थितियों से जूझ रहे लाल बिहारी ने अपने दिल में नित ही उठ जाते दर्द को  पैरासिटामाल-ब्रूफेन से दबाते। डाक्टर के बार-बार चेताने और बताने के बाद भी बड़े अस्पताल की ओर जाने में जेब बांध लेती कदम। प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएम-जय) का कार्ड हाथ आया तो धमनी का ब्लाकेज दूर हुआ और कह सकते हैं कि स्टेंट लगने के बाद उन्होंने यथा नाम आयुष्मान का ही आशीर्वाद पाया। कुछ ऐसा ही हुआ गरीब-गुरबा आबादी में शामिल कृष्णा व भोलू के साथ जो घुटना व कूल्हा प्रत्यारोपण के बाद अब अपने पैरों पर खड़े हैं। हरहुआ के भगवानी, बड़ागांव के बेचन, सेवापुरी की सोनी, चोलापुर के पप्पू समेत तमाम व्याधियों से मुक्त हो सपनों में रंग भरने में जुटे हैं। 

वास्तव में सरकारी अस्पतालों में ईलाज की मुफ्त सुविधा तो पहले से थी लेकिन बात सामान्य सूई-दवा तक रह जाती थी। रोग की गंभीरता पर डाक्टर के बाहर की दवा के पर्चे खर्चे के अहसास मात्र से दर्द दो गुना कर जाते थे और किसी चमत्कार की आस में जीवन बिताते थे। पीएम जन आरोग्य योजना के बाद बनारस में ऐसे 80 हजार परिवारों को देश में कहीं भी योजना के तहत अनुबंधित अस्पताल में इलाज कराने के लिए गोल्डन कार्ड मिल चुका है। हालांकि वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार इसकी प्राथमिक सूची में पौने दो लाख नाम थे लेकिन जांच-परख के बाद 1.20 लाख पात्र पाए गए। इसके अलावा पूर्वांचल से लेकर पश्चिमी बिहार और मध्यप्रदेश तक की चिकित्सा का हब होने से यहां इलाज के लिए अन्य जिलों व प्रांतों से भी लोग आते हैं और बीएचयू, ट्रामा सेंटर, कैंसर समेत अस्पतालों में लगभग सभी बीमारियों से पूरी तरह मुफ्त राहत पा रहे हैं। 

बनारस को प्रशंसा पत्र : प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना में बेहतरी के लिए बनारस को हाल ही में राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण ने प्रशंसा पत्र दिया। उत्तर प्रदेश में बनारस के पहला स्थान रखने पर स्वास्थ्य मंत्री डा. सिद्धार्थनाथ सिंह ने भी चार जनवरी को बनारस में ही आयोजित समारोह में सम्मानित किया।

कैंसर रोगी लाचार, भाग-दौड़ बेकार

केंद्र सरकार की ओर से जन आरोग्य के निमित्त लागू योजना के गति पकडऩे के साथ इसकी खामियां भी सामने आ रही हैं। इस वजह से प्रतापगढ़ से इलाज के लिए बीएचयू आए 40 वर्षीय कैंसर पीडि़त को दो दिनों से बीएचयू में भटकना पड़ा। कीमो थेरपी के लिए उन्हें भर्ती तो कर लिया गया लेकिन आयुष्मान मित्र के पास जाने पर पता चला की कीमो की मुख्य दवा पैकेज लिस्ट में नहीं है। ऐसे में इससे संबंधित दवाएं मुफ्त नहीं मिल पाएंगी। इन शब्दों ने युवक के पैरों तले से जमीन ही खिसका दी। कैंसर के ही कारण दो साल पहले युवक का एक पैर काटा जा चुका है। बाद में रीढ़ के पास ट्यूमर होने पर इलाज के लिए बीएचयू आए तो डाक्टर ने ट्यूमर बताया। 

यही नहीं गांव-देहात में आमतौर पर होने वाली हार्निया के निजी अस्पतालों द्वारा सूचीबद्ध न होने का हवाला दिया जा रहा है। इससे हरहुआ के मोहनपुर निवासी मुन्नालाल पटेल इलाज में कर्जदार हो गए। गोल्डन कार्ड लेकर अस्पतालों की खाक छानने के बाद उन्होंने थक हार कर लोगों से कर्ज लिया और सुतबलपुर स्थित एक अस्पताल में आपरेशन कराया। इसमें उनके 20 हजार रुपये खर्च हुए। मुन्नालाल के पास सिर्फ चार बिस्वा जमीन है, खर्चे पूरे करने के लिए लिए अधिया लेकर भी खेती करते हैं। इसके अलावा काशी विद्यापीठ ब्लाक के जफराबाद निवासी 59 वर्षीय प्यारेलाल पाल पाइल्स के इलाज के लिए अखरी बाईपास स्थित निजी अस्पताल गए तो डाक्टर ने सिर्फ आपरेशन की बात सुनाते हुए दवा से हाथ खड़े कर दिए जब कि योजना में अस्पताल में दाखिल होने से पहले व बाद के सभी खर्च कवर हैं।

शामिल सरकारी अस्पताल : बीएचयू अस्पताल, बीएचयू ट्रामा सेंटर, होमी भाभा कैंसर सेंटर, शिवप्रसाद गुप्त मंडलीय अस्पताल, पं. दीनदयाल उपाध्याय राजकीय अस्पताल, राजकीय महिला अस्पताल, लालबहादुर राजकीय चिकित्सालय, मानसिक अस्पताल, चोलापुर-आराजी लाइन सीएचसी। 

Posted By: Abhishek Sharma