काशी में चार मिनट की भरत मिलाप की लीला में जीवंत हो उठी त्रेतायुग की झांकी, लाखों की उमड़ी भीड़
काशी के नाटी इमली में विश्व प्रसिद्ध भरत मिलाप का आयोजन हुआ, जिसमें लाखों की भीड़ उमड़ी। चार मिनट की ...और पढ़ें
HighLights
काशी के नाटी इमली में हुआ विश्व प्रसिद्ध भरत मिलाप।
चार मिनट की लीला में त्रेतायुग जीवंत हो उठा।
लाखों श्रद्धालुओं ने 483 वर्ष पुरानी परंपरा का अनुभव किया।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। काशी के सबसे बड़े लक्खा मेलों में से एक भरत मिलाप का आयोजन काशी में हुआ तो लाखों की भीड़ का दूर दूर तक कोई ओर छोर नहीं दिखा। जिसे जगह नहीं मिली वह दूसरे की छत पर एक पल को निहार लेने के लिए आतुर नजर आया। नाटी इमली के मुख्य आयोजन स्थल से लेकर गलियों तक मानस का पाठ और भरत मिलाप के उस छण को जी भर कर निहार लेने की आतुरता नजर आई।
चित्रकूट रामलीला समिति की ओर से गुरुवार कोनाटीइमलीका विश्व प्रसिद्ध भरत मिलाप आयोजित किया गया। गोधूलि बेला में वनवास से लौटे राम-लक्ष्मण, भरत-शत्रुघ्न से मिलेंगे और लगभग चार मिनट की लीला में नाटीइमली मैदान ने अयोध्या होने का आभास कराया और त्रेता जीवंत हो उठा। परंपरागत काशी की इस लक्खा मेले के आयोजन में चारों भाइयों का मिलन होते ही हर हर महादेव और जय श्रीराम का घोष गूंज उठा।
नाटी इमली परिक्षेत्र के आधा किलोमीटर में लाखों आंखें 483 वर्ष पुरानी परंपरा को प्रवाहमान होते निहारती रहीं। श्रीराम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न का मिलन तय मुहूर्त के अनुसार 3.36 बजे हुआ। चित्रकूट से प्रभु श्रीराम-लक्ष्मण मय सीता-हनुमान तो अयोध्या से नंगे पांव दौड़े आए भरत-शत्रुघ्न। इस विश्वविख्यात मेला का मान लक्खा मेला का है और उसी अनुरूप काशी में इस परंपरा का निर्वाह हुआ तो आस्था का कोई ओर छोर नजर नहीं आया।
एक ओर अस्ताचल में डूब जाने को कुछ ही शेष बचा था सूर्य का अंश तो दूसरी ओर भ्रातृ प्रेम का अनुपम आदर्श गढ़ रहा था सूर्यवंश। गुरुवार शाम संपूर्ण ब्रह्मांड मानो ब्रह्मांडनायक की अनोखी भावलीला और भ्रातृभाव के आदर्श का सर्वोत्कृष्ट स्वरूप देखने को ठहर सा गया था। श्रीराम-भरत मिलाप की विश्वप्रसिद्ध लीला का 484वां संस्करण नाटी इमली के मैदान में आयोजित हुआ तो शिव की काशी में त्रेता का वह पावन क्षण सजीव हो उठा।
लक्खा मेला में चारों भाइयों के भावपूर्ण मिलन देख लाखों श्रद्धालुओं की पलकों से खुशियों के अनगिन मोती छलक उठे तो हजारों कंठों से ‘चारों भइयन की जय’ ‘जय श्रीराम’ व ‘हर-हर महादेव’ का उद्घोष फूट पड़ा। गले मिल चारों भाइयों के साथ ही जनकनंदिनी सीता मइया ने भक्तों को दर्शन दिए।
चारों भाइयों के मिलन की दुर्लभ छवि हमेशा के लिए सहेज लेने को आतुर काशीवासियों की सजल आंखों समूचे दृश्य को हृदय में बसाया तो सहज ही जुड़ उठे दोनों हाथ, झुक उठे माथ। ढलती सांझ की बेला में इस भावपूर्ण दृश्य की सरस गरिमा को अनंत ब्रह्मांड ने अपने हृदय पटल पर अंकित कर लिया। परंपरानुसार काशिराज परिवार के अनंत नारायण सिंह ने भी लीला स्थल पहुंच कर इस भावपूर्ण दृश्य को निहारा तो भगवान राम व लक्ष्मण बने प्रभु स्वरूपों को गिन्नियां भेंट कर तुलसीदल व पुष्प प्रसाद ग्रहण किया।
दोपहर से ही जुटने लगी थी श्रद्धालुओं की भीड़
दोपहर के एक बजे से ही हर पग नाटी इमली की ओर बढ़ चले थे। बांस-बल्लियों से घिरा मैदान जब लोगों से पट गया तो आसपास की सड़कें, छतें सभी असंख्यजनों से अट गईं। युवा, बुजुर्ग व बालमन सभी ने पलकों में प्रभु की मूरत बसाए, लीला मंच पर नजरें गड़ाए एक झलक पा लेने का हर प्रकार से जतन किया। घड़ी की सुइयों के 4.35 बजने का संकेत देते ही हृदय की धड़कनें बढ़ गईं।
रामदूत हनुमान से हृदयप्रिय बड़े भैया के आगमन का समाचार पाकर भरत लाल अयोध्या (बड़ा गणेश) से नंगे पांव दौड़ते चले आए और निर्धारित मंच पर पहुंचे। ज्योंहि 4:40 बजे सूर्य की किरणें मैदान में एक विशिष्ट स्थान पर पहुंचीं, भरत-शत्रुघ्न प्रभु चरणों में साष्टांग दंडवत लोट गए। गोस्वामी तुलसीदास की चौपाई "परे भूमि नहि उठत उठाए, बल करि कृपा सिंधु उर लाए। श्यामल गात रोम भए ठाढ़े, नव राजीवनयन जल बाढ़े" गूंज के बीच दौड़कर पहुंचे भक्तवत्सल प्रभु ने श्रीभरत को उठा कर गले से लगा लिया।
हर्षातिरेक से पूरित वातावरण जयघोषों से गूंज उठा। हाथ की अंगुलियां उठ कर भावातिरेक से गीले हो चुके नयन के कोरों को पोंछतीं फिर हाथ परस्पर जुड़ जाते और भाव भरे हृदय से निकल जयकारों की ध्वनि वातावरण में आच्छादित हो जाती। चारों भाइयों ने प्रत्येक दिशाओं में घूमकर श्रद्धालुओं को दर्शन दिया और विभोर कर दिया तो दिव्य दृश्य से विह्वल अस्ताचलगामी सूर्य की किरणों ने भी प्रभु चरणों में लोटकर खुद को धन्य कर लिया। मिलन बाद विमान से चारों भाई, माता सीता व पवनसुत अयोध्या प्रस्थान किए। इधर मिलन चबूतरे पर प्रभु के हार से गिरे फूलों को प्रसाद स्वरूप पा लेने की भक्तों में होड़ मच गई।
