जागरण संवाददाता, वाराणसी :

जहां संस्कृत व संस्कृति है, वहां भारत है। संस्कृत व सनातन धर्म जाति-धर्म, देश, भाषा या लिंग के भेद से ऊपर है। यह सभी के लिए आत्मा है। श्रीमद्भागवत गीता जो एक बार पढ़ लेगा उसको संस्कृत व भारत को जानने की ललक बढ़ जाएगी। यह कहना है इंग्लैंड की लूसी गेस्ट ऊर्फ दिव्य प्रभा का।

वह सोमवार को संस्कृतविद्या धर्मविज्ञान संकाय की ओर से व्याकरण पर आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन में भाग लेने आई थीं। वर्तमान में वह संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में शोध करने के साथ ही नीची ब्रह्मपुरी बच्चों को मुफ्त में पढ़ा रही हैं। कार्यक्रम में देश की संस्कृति व संस्कृत को जानने के लिए देश-विदेश के कई विद्वान जुटे थे।

कार्यक्रम से इतर उन्होंने बातचीत में बताया कि एक बार जब उन्होंने इंग्लैंड में गीता पाठ पढ़ा तभी से वह भारत को जानने के लिए ¨हदुस्तान में आ गई। वह करीब 18 साल से संस्कृत की पढ़ाई कर रही हैं। उनका लक्ष्य यहां पर जॉब करना नहीं है। उनका लक्ष्य संस्कृत एवं सनातन धर्म को पूरी दुनिया में पहुंचाना है। वह संस्कृत, वेद, शास्त्र और सनातन धर्म का पूरी तरह अध्ययन करना चाहती हैं। वहीं इटली की अन्तोनेल्ला ने बताया कि भारत अपने आप में एक बड़ा ज्ञान और रत्न है। आज पूरा विश्व संस्कृत और भारत की संस्कृति को अपनाने के लिए आगे आ रहा है। अन्तोनेल्ला ने दुख जताते हुए कहा कि आज भारत की युवा पीढ़ी ही संस्कृत व संस्कृति के महत्व को समझना नहीं चाहती। हम विदेशी हैं फिर भी हमारा संस्कृत व भारत की संस्कृति के प्रति आकर्षण व जिज्ञासा बढ़ रही है।

वहीं अमेरिका से आई बेलिंदा ने कहा कि वह संस्कृत पढ़ने व समझने के लिए यहां आई हैं। वह अमेरिका में आयुर्वेद में फीजियोथेरेपिस्ट भी हैं इसलिए वह संस्कृत को लिखना, पढ़ना, समझना व बोलना चाहती हैं। कहा कि अमेरिका में भी अब दिन- प्रतिदिन संस्कृत का क्रेज बढ़ रहा है। वहां भी संस्कृत के बेहतर शिक्षा की जरूरत है। बेलिंदा ने कहा कि पूरे विश्व को संस्कृत के ज्ञान की अत्यंत ज्यादा जरूरत है।

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने कहा कि संस्कृत भाषा की रक्षा के लिए समय-समय पर अंतरराष्ट्रीय आयोजन होने जरूरी हैं। संगोष्ठियों के आयोजन से विधिशास्त्रों का परायण एवं उनकी रक्षा संभव है। इससे पहले कार्यक्रम का उद्घाटन विधि-न्याय एवं खेल राज्यमंत्री डा. नीलकंठ तिवारी एवं तिरुपति संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुरलीधर शर्मा ने किया। सम्मेलन में अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी व नेपाल के विद्वानों ने भाग लिया। इस मौके पर प्रो. यदुनाथ दुबे, प्रो. जीहोरुल्को, प्रो. रामयत्न शुक्ल, प्रो. केडी त्रिपाठी, भीम सिंह, कृष्ण कुमार, प्रो. जयशंकर लाल त्रिपाठी, प्रो. गोपबंधु मिश्र, डा. मिताली देव आदि मौजूद थीं। संचालन डा. ब्रजभूषण ओझा एवं धन्यवाद ज्ञापन डा. रामनारायण द्विवेदी ने किया।

Posted By: Jagran

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