गंगा अनुसंधान के लिए पांच दशकों से प्रो. बीडी त्रिपाठी दे रहे विशेष योगदान, 'इको-स्किल्स' माडल से तैयार हो रहे हैं 'गंगा मित्र'
प्रो. बीडी त्रिपाठी पिछले पांच दशकों से गंगा अनुसंधान में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। उनके 'इको-स्किल्स' मॉडल ने सैकड़ों ...और पढ़ें

प्रो. बीडी त्रिपाठी का पांच दशक का गंगा अनुसंधान: 'इको-स्किल्स' मॉडल से बन रहे 'गंगा मित्र'।
HighLights
प्रो. बीडी त्रिपाठी ने 50 वर्षों से गंगा प्रदूषण पर शोध किया।
उनके 'इको-स्किल्स' मॉडल ने 700 'गंगा मित्र' प्रशिक्षित किए।
यह मॉडल शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य और पर्यावरण संवेदनशीलता बढ़ाता है।
शिवम सिंह जागरण, वाराणसी। गंगा किनारे का यह बुजुर्ग बागबान पिछले पांच दशकों से ज्ञान का बगीचा सींच रहा है। साकेतनगर के 80 वर्षीय प्रो. बीडी त्रिपाठी, जिन्होंने 1972 में गंगा जल प्रदूषण पर शोध की नींव रखी, आज भी उसी जुनून के साथ काम कर रहे हैं।
महामना मालवीय गंगा अनुसंधान केंद्र (बीएचयू) के पूर्व अध्यक्ष और प्रख्यात पर्यावरणविद् प्रो. त्रिपाठी ने अपनी आधी सदी की मेहनत को सिर्फ रिपोर्टों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने उसे ‘इको-स्किल्स’ नामक जीवन कौशल में बदल दिया, जिससे देश भर में सैकड़ों ‘गंगा मित्र’ तैयार हो रहे हैं।
वाराणसी में बैठे इस वैज्ञानिक की कहानी किसी आम शोधकर्ता की नहीं है। युवावस्था में जब उन्होंने गंगा के पानी में बढ़ते प्रदूषण को महसूस किया, तब से नदी उनके लिए प्रयोगशाला बन गई। पांच दशकों से अधिक समय तक निरंतर अध्ययन, अनुभव और अंतर्दृष्टि को उन्होंने एक व्यावहारिक ढांचे में पिरोया।
यही ‘इको-स्किल्स फ्रेमवर्क’ है, जो सिर्फ पर्यावरण संरक्षण नहीं सिखाता, बल्कि व्यक्ति के शरीर, मन और व्यक्तित्व को भी निखारता है। शुरुआत पायलट अध्ययन से हुई। 18 से 45 वर्ष के 400 विविध उम्मीदवारों-अलग-अलग शैक्षणिक पृष्ठभूमि, लिंग और सामाजिक वर्ग के लोगों पर इसे आजमाया गया।
परिणाम इतने सकारात्मक निकले कि राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) के अधिकारियों ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार देने का फैसला किया। महामना मालवीय गंगा अनुसंधान केंद्र और सुधा इंस्टीट्यूट आफ एनवायरनमेंट एंड टेक्नोलॉजी (एसआईईटी) के सहयोग से अब तक 700 युवाओं को ‘इको-स्किल्ड गंगा मित्र’ के रूप में प्रशिक्षित किया जा चुका है।
प्रो. त्रिपाठी कहते हैं कि इको-स्किल्स महज प्रशिक्षण नहीं, जीवन जीने की कला है। स्वस्थ व्यक्ति से संवेदनशील समाज बनेगा, स्वच्छ गंगा बनेगी और समृद्ध भारत का निर्माण होगा। सत्तर के दशक में शुरू हुई उनकी यात्रा आज एक राष्ट्रीय आंदोलन का रूप ले चुकी है। प्रयोगशालाओं से निकलकर आम लोगों के जीवन में उतर चुका यह बागबान अभी भी नई पीढ़ी को सींच रहा है। गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिए उनका यह प्रयास दर्शाता है कि सच्ची शोध सिर्फ किताबों में नहीं, समाज की जड़ों में उतरती है।
स्वतंत्र प्रभाव मूल्यांकन में पांच आयामों में डालता असर असर
स्वतंत्र प्रभाव मूल्यांकन में साफ हुआ कि यह माडल पांच आयामों में असर डालता है। शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य, पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता (इको-केंद्रीकरण), आत्म-जागरूकता और पूर्ण व्यक्तित्व विकास। योग, ध्यान, संतुलित आहार, तनाव प्रबंधन और प्रकृति से जुड़ाव के जरिए युवा न सिर्फ स्वस्थ बन रहे हैं, बल्कि गंगा संरक्षण के प्रति समर्पित भी हो रहे हैं। डीएसटी-एनसीएसटीसी के सहयोग से अब यह कार्यक्रम 10 विद्यालयों में तीन हजार से अधिक विद्यार्थियों तक पहुंच चुका है।
