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132 साल बाद अपनी जड़ों की तलाश में सूरीनाम से गाजीपुर पहुंचा परिवार, पूर्वजों की खोज के लिए दिया डीएनए सैंपल

By Vns Shailesh Asthana Edited By: Abhishek sharma
Published: Wed, 14 Oct 2026 06:01 PM (IST)

सूरीनाम से एक परिवार अपने 70 वर्षीय पिता के सपने को पूरा करने और पूर्वजों की तलाश में वाराणसी व ...और पढ़ें

HighLights

  1. सूरीनाम से परिवार पूर्वजों की तलाश में गाजीपुर पहुंचा।

  2. वंशावली पुष्टि हेतु 'ज्ञान लैब' में डीएनए सैंपल दिया।

  3. पूर्वज 1894 में गिरमिटिया मजदूर के रूप में गए थे।

जागरण संवादाता, वाराणसी। सूरीनाम से एक परिवार अपने पूर्वजों की तलाश में सात समंदर पार कर भारत पहुंचा है। जॉन मोहनलाल रामनंदनलाल और शारदा रामनंदनलाल ने अपने 70 वर्षीय पिता का जीवन भर का सपना पूरा करने के लिए बनारस और गाजीपुर जिले के खानपुर गांव का दौरा किया है। इस यात्रा के दौरान, परिवार ने अपनी वंशावली की वैज्ञानिक पुष्टि के लिए आज 'ज्ञान लैब' में प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे को अपना डीएनए सैंपल भी बुधवार को सौंपा है।

ऐतिहासिक दस्तावेजों और शोध रिपोर्ट के अनुसार, इस परिवार के पूर्वज रामनंदन और उनकी पत्नी राजवंतिया उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के सैदपुर थाना अंतर्गत खानपुर गांव के रहने वाले थे। उस समय रामनंदन की उम्र मात्र 24 वर्ष थी और उनके पिता का नाम होरोपुरसाद (हरि प्रसाद) था। वहीं, राजवंतिया की उम्र 22 वर्ष थी और उनके पिता का नाम बरम चारीलाल था।

यह दंपति कायस्थ समुदाय से ताल्लुक रखता था। वे 25 अगस्त 1894 को कलकत्ता से 'एम्स' नामक अंग्रेजी जहाज से गिरमिटिया मजदूर के रूप में सूरीनाम (पारामारिबो) के लिए निकले थे। उस जहाज पर करीब 400 से 500 अन्य यात्री भी सवार थे। 89 दिनों की लंबी और कठिन समुद्री यात्रा के बाद, वे 22 नवंबर 1894 को पारामारिबो पहुंचे। वहां पहुंचने के बाद उन्हें निकेरी जिले के 'वाटरलू' बागान में काम पर रखा गया था।

सूरीनाम में बसने और अपना अनुबंध पूरा करने के बाद, 20 दिसंबर 1911 को रामनंदन और राजवंतिया ने आधिकारिक तौर पर विवाह किया। इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि उनके बेटे जयकरम ने 15 अक्टूबर 1934 को आधिकारिक रूप से 'रामनंदनलाल' उपनाम चुना, जिससे आज की यह पीढ़ी आगे बढ़ी है।

सूरीनाम में बसे इस परिवार के पास अपने पूर्वजों के बारे में बहुत कम जानकारी थी और उन्हें यह भी नहीं पता था कि अपनी जड़ों की खोज आखिर कहां से शुरू की जाए। परिवार के 70 वर्षीय बुजुर्ग की हमेशा से यह दिली ख्वाहिश थी कि वह उस मिट्टी को अपनी आंखों से देखें जहां से उनके पूर्वज आए थे। आधुनिक तकनीक का सहारा लेते हुए, गिरमिटिया काल के लोगों व जहाजों के नए डेटाबेस तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से उन्हें अपने खानदान के बारे में कई अहम जानकारियां हासिल हुईं।

डॉ. पवन और अन्य संपर्कों की मदद से परिवार बनारस पहुंचा और वहां से गाजीपुर के खानपुर गांव जाकर स्थानीय लोगों से मुलाकात की। अब ज्ञान लैब को दिए गए डीएनए टेस्ट के नतीजों से यह परिवार पूर्वी उत्तर प्रदेश और गाजीपुर में अपने संभावित भारतीय रक्त संबंधियों को खोजने तथा अपनी जड़ों की वैज्ञानिक तौर पर पुष्टि होने की पूरी उम्मीद कर रहा है।