वाराणसी, कुमार अजय। अपने राष्ट्रगान के अलावा विराट भारत का दर्शन कराने वाली ये पंक्तियां अगर कहीं जीवंत रूप में दिखाई पड़ती हैं तो वह है शहर बनारस। जहां अल सुबह कश्मीर से कन्याकुमारी तक और कटक से अटक तक के लोगों का जनप्रवाह कहीं तीर्थयात्री तो कहीं सैलानी के रूप में तरंगित होता नजर आता है। संपूर्ण भारत की झांकी की छाप छोड़ जाता है। अलग भाषा, अलग वेश फिर भी अपना एक देश के संदेश को मजबूती देने वाली इस अनुपम झांकी को सुबह-ए-बनारस की पहली किरण हर रोज सलामी देती है। शस्य श्यामला भारत मां की संपूर्ण काया को नजरों में उतार देती है।

रात का चौथा पहर। समय चार बजे। स्थान- गोदौलिया चौराहा। चौराहे को शहर दक्षिणी से जोड़ने वाली सड़क का सन्नाटा टूटता है और राह अचानक ही मनसायन हो जाती है। धुंधलके को चीरते हाईमास्ट के प्रकाश में नजर आता है एक जोशीला दृश्य और कानों से टकराती हैं एक अबूझ भाषा के समूह गान की स्वरलहरियां। सामने है दक्षिण भारतीय वेशभूषा में सजी तीर्थ यात्रियों की एक टोली जो भजन गाते सुरसरि में डुबकी लगाने की कामना संजोए बढ़ रही है गंगा तट की ओर।

मानसरोवर के श्रीराम तारक आंध्र आश्रम से निकली विजयवाड़ा के इन तीर्थ यात्रियों की भाषा तो समझ नहीं आती, मगर गीत में बार-बार काशी विश्वनाथ और गंगा के उच्चारण से पता चल जाता है कि भजन भोले बाबा और गंगा मइया की महिमा के नाम समर्पित है। दल अभी कुछ ही कदम आगे बढ़ा होगा कि जंगमबाड़ी मठ से चले विशेष पहनावे वाले वीर शैवों की एक टोली भी हर शंभो-हर-हर गंगे का उद्घोष करती इस भीड़ में विलीन हो जाती है। यह दल है कन्नड़ भाषी श्रद्धालुओं का जो बाबा के दर्शन को मुंह अंधेरे ही विश्वनाथ धाम की ओर निकल पड़ा है।

भोर के 4.30 बजे। चौराहे के उत्तर बांसफाटक से आने वाली सड़क पर नजर आता है हर-हर महादेव शंभो, काशी विश्वनाथ के घोष से वातावरण को गुंजाता पताकाधारी श्रद्धालुओं का एक जत्था जिनकी बोली के टोन और पहनावे से ही पता चल जाता है कि ये गुजराती श्रद्धालु निकल पड़े हैं पतितपावनी गंगा की गोद में गोता लगाने की अभिलाषा मन में धारण किए। मछोदरी के स्वामी नारायण मंदिर से चले इस जत्थे के नायक विशेष व्यास बताते हैं- बरसों से अभिलाषा थी काशी यात्रा की। आज यह साकार हुई। वे दंग हैं यहां का नजारा देखकर जिसमें उन्हें भान ही नहीं होता कि यहां रात भी होती होगी।

सुबह के 5.15 बजे, स्थान - डेढ़सी पुल। बस पौ फटने को है। कमच्छा के तेलवाला धर्मशाला से गंगा स्नान को चले श्रद्धालुओं ने यहां विश्राम को पड़ाव डाल रखा है। ठीक उसी समय पीछे से आ रहे बाकी तीनों जत्थे भी श्रीकाशी विश्वनाथ धाम के द्वार के सामने कुछ पल के लिए यहां आपस में गड्ड-मड्ड हो जाते हैं। यह संगम है विभिन्न भाषाओं, जीवनशैलियों और विलग संस्कृतियों का जिसे श्रद्धा और आस्था की मजबूत डोर ने आज एकाकार कर दिया है। गवाह बनी है लघु भारत के रूप में विख्यात काशी नगरी जो आज भी हर रोज भारत-भू के विराट स्वरूप का दिग्दर्शन कराती है। सूरज की पहली किरण का प्रणाम पाती है।

सुबह के छह बजते-बजते तो ऐसे कई लघु और दीर्घ दृश्य बनते और बिगड़ते हैं जिनमें पूरब-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण पूरे वजूद के साथ एक-दूसरे में विलीन होते दीख पड़ते हैं। इसी में समाती विदेशी सैलानियों की एक अलग धारा से सुबह-ए-बनारस का सौंदर्य फलक और विस्तार पाता है।

ख्यात दर्शनशास्त्री प्रो. देवव्रत चौबे कहते हैं- 'सुबह-ए-बनारस का यह सबसे चटख रंग है जो आंखों को ही नहीं, दिल को भी सुकून देता है। अनेकता में एकता के दम पर काल से भी जूझ जाने की ऊर्जा भरता है। सुबह-ए-बनारस को सलाम करके लौटते वक्त मन की एक जिज्ञासा को अनायास ही समाधान मिल जाता है। गंगा तट पर बैठे-बैठे देश को एक सूत्र में बांधने के लिए चार दिशाओं में चार पीठों की स्थापना के आदि शंकराचार्य के विचार ने कब और कैसे आकार लिया होगा, यह आभास करा जाता है।'

Edited By: Saurabh Chakravarty