शवयात्रा पर काशी में बजाया हार्न तो सुनना पड़ेगा - 'का गुरु, इनहूं से जल्दी हव का तोहके जाए के?'
बनारस सिर्फ मंदिरों और घाटों का शहर नहीं, बल्कि यहां की जिंदगी अपनी रफ्तार से चलती है, जहां दिलों में ...और पढ़ें

बनारस की गलियों से सड़कों तक बिखरा है बनारसीपन, ठेठ अंदाज में भी झलकता है अपनापन।
HighLights
बनारस की गलियों में जिंदगी की अपनी रफ्तार।
शवयात्रा में भी बनारसी सहजता और हास्य का मेल।
मध्य प्रदेश के रामवृक्ष ने अनुभव किया बनारसी मिजाज।
सोनू सिंह, जागरण, वाराणसी। बनारस सिर्फ मंदिरों, घाटों, गंगा और पान की नगरी नहीं है। यह एक ऐसा शहर है, जहां जिंदगी अपनी रफ्तार से चलती है। यहां की गलियों में जगह कम है, मगर दिलों में जगह की कोई कमी नहीं। बनारस की किसी तंग गली की कल्पना कीजिए। चार लोग कंधे पर शव लेकर मणिकर्णिका घाट की ओर जा रहे हैं। आगे शवयात्रा, पीछे परिजन और आसपास से गुजरते राहगीर। तभी पीछे से एक बाइक सवार हार्न बजाने लगता है।
शायद उसे कहीं पहुंचने की जल्दी है। लगातार हार्न बजने पर शवयात्रा में शामिल कोई बनारसी सहज ही बोल पड़ता है- 'का गुरु, इनहूं से जल्दी हव का तोहके जाए के', इतना सुनते ही माहौल में हल्की मुस्कान तैर जाती है। न लंबी बहस, न बात को प्रतिष्ठा का सवाल बनाने की कोशिश। बाइक सवार भी मुस्कुराते हुए रास्ता मिलने का इंतजार करता है। शवयात्रा आगे बढ़ती रहती है और साथ में गूंजता रहता है 'राम नाम सत्य है'।
ठेठ बोली में भी घुला रहता है अपनापन
बनारस की गलियों में चलते हुए अक्सर ऐसे शब्द और अंदाज सुनने को मिलते हैं, जो किसी दूसरे शहर के व्यक्ति को हैरान कर सकते हैं। यहां दोस्तों के बीच बातचीत में तंज, चुहलबाजी और बेबाकी आम है। कई बार शब्दों से ज्यादा बोलने वाले का लहजा, चेहरे के भाव और सामने वाले से उसका रिश्ता मायने रखता है। यही कारण है कि यहां तकरार और ठहाकों के बीच की दूरी कभी-कभी बहुत कम रह जाती है।
मध्य प्रदेश से आए रामवृक्ष यादव भी हुए बनारसी मिजाज के कायल
मध्य प्रदेश के सागर जिले के रहने वाले रामवृक्ष यादव पहली बार बनारस घूमने आए थे। एक दिन वह बाइक से संकटमोचन दर्शन के लिए जा रहे थे। बनारस के यातायात के बीच पीछे से आ रही एक बाइक उनकी बाइक से टकरा गई। रामवृक्ष को लगा कि अब विवाद बढ़ेगा, लेकिन पीछे बाइक चला रहे व्यक्ति ने कुछ देर बाद सहज अंदाज में कहा 'अरे यार, जल्दी में रहल' बात आई गई हो गई। न मारपीट हुई और न किसी ने इसे प्रतिष्ठा का सवाल बनाया। रामवृक्ष के लिए यह अनुभव खास था।
