वाराणसी, जेएनएन। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में ग्रह-नक्षत्रों की गणना पर ग्रहण लगा हुआ है। परिसर में स्थापित आधुनिक वेधशाला की मार्किंग धूमिल पड़ने लगी है। वहीं टेक्निकल सहायक के अभाव में परंपरागत ज्योतिष के यंत्र-तंत्र बक्से में कैद हैं। इसके चलते ज्योतिष के छात्र प्रायोगिक ज्ञान से वंचित हैं। छात्रों को सिर्फ सैद्धांतिक ज्ञान का ही बोध कराया जा रहा है, वह भी संविदा के अध्यापकों के भरोसे।

प्राच्य विद्या के संरक्षण व संवर्धन के लिए स्थापित संस्कृत विश्वविद्यालय में अध्यापकों के 112 पदों में से 77 पद रिक्त हैं। ज्योतिष विभाग महज एक अध्यापक के भरोसे चल रहा है। जबकि ज्योतिष विभाग में अध्यापकों के पांच पद स्वीकृत हैं। इसके अलावा वेधशाला सहायक व पंचांग सहायक के चारों पद रिक्त चल रहे हैं।

हालत यह है कि पंचांग के लिए विश्वविद्यालय अब पूरी तरह नासा के आंकड़ों पर आश्रित हो गई है। विश्वविद्यालय में ग्रह-नक्षत्रों की गणना सिर्फ कागजों पर ही सीमित हो गई है। इसके पीछे आर्थिक संकट भी एक बड़ा कारण बताया जा रहा है। परंपरागत विषयों की पढ़ाई होने के कारण विवि के पास आय का कोई विशेष स्रोत नहीं है। विवि को शासन के अनुदान पर निर्भर रहना होता है। वहीं शासन अध्यापकों व कर्मचारियों के वेतन तक के लिए पूरा अनुदान नहीं दे रही है। इसे देखते हुए विवि अपने खर्चो को सीमित कर लिया है। ज्योतिष व कर्मकांड की डिमांड ज्योतिष व कर्मकांड की डिमांड देश में ही नहीं विदेशों में भी बढ़ती जा रही है। आय का स्रोत व्यापक होने के कारण ज्योतिष विभाग में दाखिले के लिए मारामारी होती है।

बोले कुलपति  : आधुनिक वेधशाला की मार्किंग धूमिल पड़ने की जानकारी है। वेधशाला की मरम्मत करने लिए रूपरेखा बनाई जा रही है। साथ ही परंपरागत वेधशाला बनवाने का भी प्रस्ताव है। शिक्षकों की नियुक्तियां भी जल्द की जाएगी। -प्रो. राजाराम शुक्ल, कुलपति।

बोले विभागीय अधिकारी : टेलीस्कोप सहित ज्योतिष के अन्य यंत्र-तंत्र सुरक्षित रखे हुए हैं। टेलीस्कोप पूरी तरह काम करता है। टेक्निकल सहायक न होने के कारण फिलहाल इसका उपयोग नहीं किया जा रहा है। -प्रो. सदानंद शुक्ल, विभागाध्यक्ष।

लोकसभा चुनाव और क्रिकेट से संबंधित अपडेट पाने के लिए डाउनलोड करें जागरण एप

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप