वाराणसी, जेएनएन। संविधान निर्माता डा. भीमराव आंबेडकर का जन्म 14अप्रैल 1891 को हुआ था। अप्रैल यानी वसंत ऋतु जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों को नवीनता देती है। ये ज्योतिबा फूले और राहुल सांकृत्यायन के जन्म का भी माह है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रकृति ने ज्ञान-विचारशीलता और सहृदयता तीनों का मानव धर्म के विकास के लिए सृजन किया। ये दिन भारत के आधुनिक इतिहास में अमर रहेगा, क्योंकि सदियों से शोषित पीडि़त करोड़ों जनता को 129 वर्ष पूर्व सामाजिक-आर्थिक, धार्मिक-राजनीतिक आंदोलनों के लिए प्रेरित करने वाले मुक्तिदाता का जन्म हुआ था, जो बौद्ध धर्म अपनाने के बाद वर्ष 1956 में काशी भी आए थे।

बाबा साहब ने 14 अक्टूबर 1956 को बौद्ध धर्म अपना लिया। इसके बाद जब वे वाराणसी के कैंट स्टेशन पर रात एक बजे उतरे तो बीएचयू के छात्रों, बौद्ध अनुयायियों ने उनका भव्य स्वागत किया। वह सारनाथ बौद्ध मंदिर भी गए। 24 नवंबर को बीएचयू व काशी विद्यापीठ में छात्रों को संबोधित किया। जहां कहा कि जो काम शंकराचार्य ने हिंदुओं के लिए किया वही काम धर्म के लिए मैं करूंगा। सभाकक्ष में शंकराचार्य के विचार ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या पर बोलते हुए  कहा कि ब्रह्मï सर्वव्यापी है तो ब्राह्मïण व अछूत बराबर हुए लेकिन शंकराचार्य ने अपना वाद समाज व्यवस्था पर लागू नहीं किया और अपने वाद को वेदांती स्तर पर ही लागू किया। यदि उन्होंने सामाजिक स्तर पर लागू किया होता तो उनका साध्य कहीं अधिक गहरा व विचार योग्य होता। इसके अलावा उनका यह विश्वास भ्रामक था कि संसार एक स्वप्न है।

असली मुक्तिदाता थे बाबा साहब

ऐसा प्रतीत होता है कि बाबा साहब बौद्ध धर्म अपनाने से बहुत पहले इसे आत्मसात कर चुके थे। वे महामानव की तरह ही वर्ण व्यवस्था के खिलाफ शांतिपूर्ण एवं अहिंसक अभियान चलाते रहे। वह उत्पीडि़त जनता की समस्या को गंभीरता से उजागर करते थे, क्योंकि वे वर्ण व्यवस्था जैसी घातक विचारधारा के शिकार थे। इसका अर्थ यह कदापि नहीं बाबा साहब सिर्फ एक जाति या समुदाय केउद्धारक थे। वह भारत के असली मुक्तिदाता थे।

लगे रहे बुराइयों की समाप्ति में

महिलाओं को पुरुष प्रधान समाज से छुटकारा दिलाने की दिशा में उन्होंने एक मजबूत नींव डाली थी। समाज में वर्ण व्यवस्था के तहत हर वर्ग की महिलाओं को स्थिति अत्यंत भेदभावपूर्ण थी। कट्टरपंथी सोच व परंपराओं के चलते अनेक अवसरों पर आम महिलाओं के साथ दलितों जैसा ही व्यवहार किया जाता था। ऐसा व्यवहार कोई बाहरी नहीं बल्कि घर के लोगों द्वारा किया जाता था। इससे ऐसा लगता है कि दार्शनिक रूसो का यह कथन सही है कि  बुराइयों की जड़ मानव स्वभाव में नहीं बल्कि इसकी उत्पत्ति खराब समाज से होती है। बाबा साहब ने इन सभी बुराइयों को समाप्त करने का प्रयास किया। सदियों से हिंदू धर्म के भीतर दलितों के उद्धार की संभावनाएं धूमिल देखकर बाबा साहब ने 13 अक्टूबर 1935 को नासिक के निकट यओला में एक सम्मेलन में बोलते हुए धर्म परिवर्तन का इच्छा प्रकट की और कहा कि दुर्भाग्य से हिंदू धर्म में पैदा हुआ। यह मेरे बस की बात नहीं थी परंतु हिंदू धर्म में रहते हुए मरूंगा नहीं यह मेरे बस की बात है।

छुआछूत है आतंरिक उपनिवेशवाद

वर्ण व्यवस्था के खिलाफ पांचवीं कोसी में गौतम बुद्ध द्वारा पहला संघर्ष किया गया था। बाबा साहब दलित मुक्ति को भारत की मुक्ति का सबसे महत्वपूर्ण मार्ग समझते थे। इसलिए अपने कट्टर विरोधियों की परवाह किए बिना वर्ण व्यवस्था तथा छुआछूत को भारत का सबसे बड़ा दुश्मन मानते थे। यही कारण था कि वह विदेशी उपनिवेशवाद के विरुद्ध चल रहे संघर्ष संग वर्ण व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करना चाहते थे। क्योंकि उनके अनुसार वर्ण व्यवस्था तथा छुआछूत एक दुखदाई आंतरिक उपनिवेशवाद है।

अंग्रेजों का साथ देने का आरोप मिथ्या

आंबेडकर का वर्ण व्यवस्था विरोधी संघर्ष दोहरी गुलामी यानी आंतरिक उपनिवेशवाद (वर्ण व्यवस्था और बाहरी उपनिवेशवाद अंग्रेजी सत्ता) से देश को बचाना था न कि अंग्रेजों का साथ देना, जैसा कि कुछ लोगों द्वारा आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने अंग्रेजों का साथ दिया था। उनका मानना था कि जातिविहीन समाज की स्थापना के बिना स्वराज प्राप्ति का कोई महत्व नहीं है और यही कारण है कि लगभग दो दशकों तक विभिन्न धर्म तथा संस्कृति का गहन अध्ययन करने के बाद नागपुर की धरती पर 14 अक्टूबर 1956 को लाखों दलितों संग बुद्ध धर्म की दीक्षा ली। उनकेकदम से भारत में गौतम बुद्ध की शांति, समानता, विश्व बंधुत्व की विचारधारा को एक बार पुन: जीवित कर दिया। जिस पर विद्वान राहुल सांकृत्यायन ने लिखा था कि बाबा साहब आंबेडकर ने भारत में बौद्ध धर्म का जो खंभा गाड़ा है अब उसे कोई हिला नहीं सकता। दुनिया के अनेक इतिहासकारों का यह मत है कि महान सम्राट अशोक के बाद बाबा साहब आंबेडकर की बुद्ध धर्म के विकास में बड़ी भूमिका रही है।

मुक्त बाजार व्यवस्था का सुझाव

वह मानते थे कि आर्थिक समानता के अभाव में राजनीति एवं नागरिक समानता का कोई मूल्य नहीं है। यही कारण है कि उन्होंने भारत के आर्थिक विकास के मार्ग 1923 में मुक्त बाजार व्यवस्था, निजीकरण, उदारीकरण, भूमंडलीकरण का सुझाव दिया था। देश की सरकारों ने सोवियत यूनियन के विघटन के बाद इस पर अमल शुरू किया। इससे सिद्ध होता है कि बाबा साहब हृदय से अर्थशास्त्री थे। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन ने कहा है कि वह अर्थशास्त्र में मेरे पिता है।

जाति, संप्रदाय व क्षेत्रवाद का विरोध

बाबा साहब ने बुद्ध के बहुजन हिताय बहुजन सुखाय को अपनाया था। बुद्ध ने दुनिया को प्रजातंत्र का पाठ पढ़ाया, इसलिए ग्रीक दार्शनिक सोलन ने कहा कि आधुनिक प्रजातंत्र बुद्ध के दर्शन से निकलता है। बाबा साहब भारतीय प्रजातंत्र को जाति, संप्रदाय और तीसरा क्षेत्रवाद से बचाना चाहते थे। इसी ने उन्हें दुनिया के दूसरे बड़े संविधान निर्माण के लिए प्रेरित किया, जिसमें बुद्ध के विश्व बंधुत्व, समानता और शांति संदेश को लागू करने एक प्रयास किया। परिवर्तन के नियम के आधार पर हिंदू कोड बिल संसद में पेश किया जिसका विरोध बनारस की धरती से बड़े धर्मगुरु स्वामी हरिनारायण ओझा ने किया था।

 -डा. सूर्यभान प्रसाद (लेखक महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के राजनीति विज्ञान विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं)

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