वाराणसी, कुमार अजय। मटका सिल्क के कुर्ते, परमसुख धोती और कंधे पर लटकते रत्नों से भरे झोले से सजा एक शानदार किरदार। नाम लक्ष्मी नारायण सिंह, पर लच्छू महाराज के नाम से बटोरा ढेर सारा प्यार। पिता वासुदेव सिंह से मिली तबला वादन की विरासत को थाती की तरह संभाला। चारों पट की वादन शैली की महारत से घरानेबंदी की चौहद्दी तोड़ी। बनारसबाज शैली को हिमालय सी बुलंदी देकर तबला वादन के नए आयाम गढ़े। यह बात दीगर है कि बनारस के अल्हड़पन को जी भरकर जीने वाले हुनर के इस खलीफा की अक्खड़मिजाजी ने प्रशंसकों के साथ आलोचकों की भी एक बड़ी जमात खड़ी कर डाली, पर मुद्दई लाख सही रईसाना मिजाज वाले इस कलाकार ने अपनी आन से समझौते की कभी आदत ही नहीं डाली। मूड बना तो मंच का आमंत्रण स्वीकार कर महफिल पर छा गए और जो मन उखड़ा तो आप बने रहिए बड़कवा। लच्छू महाराज ने झोला उठाया और सीधे घर आ गए। यह भी सही है कि यह तुनकमिजाजी कई मर्तबा उनकी शोहरत के आड़े आई, किंतु यहां फिक्र किसे कि अवार्ड कौन जीता और किसने कितनी रकम कमाई!

या तो कारसाजी नहीं तो अड़ीबाजी

जौहरी के रूप में अपने व्यवसाय में पूरी ईमानदारी बरतने वाले लच्छू गुरु के पास तब सिर्फ दो ही काम थे या तो बैठके में वज्रासन लगाकर साज को साजना या फिर चौक अथवा अस्सी की अड़ी पर घंटों बैठकर इधर-उधर की हवा बांधना। कलाकार की भूमिका में वह भले ही कुछ ज्यादा तल्ख मिजाज रहे हों, अड़ियों पर उनकी फक्कड़ मस्ती और रईसी, दोनों ही देखने को मिलती थीं। अस्सी अड़ी के गद्दीदार मनोज बताते हैं कि किस प्रकार वह महाराज जी को चाय के साथ अंड-बंड पिंगलों के घूंट पिलाते थे। इतनी बड़ी शख्सियत किंतु लच्छू महाराज थे कि बस परमहंसी मुद्रा में मुस्कुराए चले जाते थे। गुरु र्पूिणमा पर चार-छह किलोग्राम मालपुए व दुपट्टे के उपहार के जबराना हकदार मनोज रिक्शे पर पांव चढ़ाकर सैर पर निकले महाराज जी की वह छवि याद कर आज भी बेहद भावुक हो जाते हैं। उन्हेंं श्रद्धांजलि देते हुए कहते हैं, ‘जाने कहां गए महाराज, जो फिर लौटकर ही नहीं आए। भूलना चाहो भी तो ऐसा मस्तमौला बनारसी भुलाए नहीं भुलाता।’

नहीं सुनी फिर वैसी धमक

महाराज जी के गुरुभाई केदारनाथ भौमिक (बीएचयू के गणितज्ञ व ख्यात तबला वादक) के शिष्य व अंत समय तक लच्छू महाराज के बगलगीर रहे तबला वादक गणेश मिश्र बताते हैं, ‘पिता वासुदेव महाराज तबला वादन में एकमात्र ऐसी शख्सियत थे जिन्होंने पूरब और पश्चिम दोनों ही पट्टियों की अलहदा शैलियों को साधा था। फिर वे चाहे उस्ताद अहमद जान थिरकवा हों या हबीबउद्दीन साहेब या फिर अल्लारक्खा, सभी उनके कायल थे। मेहमाननवाजी वासुदेव जी का पसंदीदा शौक था। ऐसे में ये उस्ताद जब भी बनारस आते, उनके दालमंडी वाले आवास पर ही डेरा जमाते। इस दौरान जुगलबंदियों का सिलसिला चलता। वहीं बैठे मेजबानी निभा रहे किशोरवय लक्ष्मी नारायण को हर घराने की शैली का एकलव्य मंत्र मिलता था। जहां तक साज-बाज साधने की बात है, लच्छू गुरु की अंगुलियों से कौंधती टनक व खुली-खुली हथेलियों की गरजदार धमक उनके बाद फिर सुनने को नहीं मिली।’ गणेश मिश्र के अनुसार, परंपरावादी संगीत घरानों ने लच्छू महाराज को भले ही कभी अहमियत न दी हो, बनारसी तबला वादन के शलाका-पुरुष कंठे महाराज ने जब लच्छू का तबला वादन सुना तो विभोर हो गए। उनकी पीठ तो ठोंकी ही, एक चमकती गिन्नी का उपहार भी भेंट किया। इसे लच्छू गुरु ने आजीवन एक धरोहर की तरह सहेजे रखा।

सोलो व संगत दोनों में पारंगत

वरिष्ठ संगीतकार व लच्छू महाराज के संगी अड़ीबाज राधिका रंजन तिवारी याद करते हैं, ‘जब महाराज जी के छोटे भाई विजय महाराज घर के बैठके में ही उनके साथ ताल मिलाने बैठते थे तो घंटों रियाज के बाद भी दोनों के बाजू नहीं ऐंठते थे। कठिन रियाज की इन बैठकियों ने भी लच्छू महाराज के स्वतंत्र तबला वादन को खूब मांजा। रही नचकर्म संगत की बात तो प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना व महाराज की पहली पत्नी अन्नपूर्णा की जोड़ी भी प्राय: हर रोज साथ में अभ्यास करती और संगत की विभिन्न शैलियों में प्रयोग के नूतन रंग भरती थी।’

सांध्य बेला में नई शुरुआत

अपने मन के राजा लच्छू गुरु ने उम्र की सांध्य बेला में फ्रेंच सुंदरी टीना से विवाह कर जिंदगी की नई पारी की शुरुआत की। उस वक्त वह दालमंडी का आवास छोड़कर संकटमोचन मंदिर के समीप साकेत नगर की ओर चले आए थे। अंतिम सांस भी उन्होंने इसी ठौर पर ली। टीना और महाराज जी के गहरे प्यार की निशानी बेटी नारायणी इन दिनों स्विट्जरलैंड में हैं। टीना ही बनारस में एक जौहरी के जौहर की शेष स्मृतियों को संवारे हुए हैं और संगीत जगत के एक अलबेले सितारे की याद में श्रद्धा का दिया बारे हुए हैं।

Edited By: Shashank Pandey