मऊ, जेएनएन। MANREGA मनरेगा यानि गरीबों को रोजगार। प्रतिवर्ष महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत भले ही गरीबों को 100 दिन का रोजगार न मिले परंतु मैटेरियल मद का बड़े पैमाने पर भुगतान जरूर होगा। कोविड-19 महामारी के बीच गांवों के जाबकार्ड धारक गरीब मजदूरों व प्रवासी श्रमिकों का हक छीनते हुए जिला प्रशासन ने प्राइवेट फर्मों के नाम धड़ाधड़ ‘एफटीओ’ यानि फंड ट्रांसफर आर्डर बनाकर 32 करोड़ रुपये भुगतान कर दिए।

वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अधिक से अधिक गरीबों को रोजगार देने की बात कहते रहे परंतु पंचायत चुनावों की आहट देखते हुए सरकारी धन की लूट का खेल शुरू हो गया। कोरोना महामारी से जंग लड़ रहे लोगों में गरीबों को रोजगार के साथ आर्थिक मदद की आवश्यकता थी तो प्रशासन अपनी कारस्तानी में जुटा रहा।

जब दैनिक जागरण ने इसे उजागर किया तो प्रशासन ने एकदम चुप्पी साध ली। मऊ की खबर का संज्ञान लेते हुए तीन जून को प्रमुख सचिव शासन ने पिछले पांच वर्षों में मनरेगा के तहत श्रम व सामग्री मद में किए गए भुगतान की रिपोर्ट तलब की। इसी बीच गरीबों को दरकिनार कर प्राइवेट फर्मों पर किए गए भुगतान का मामला मुख्यमंत्री ने भी खुद संज्ञान में ले लिया। अब 06 जून को ग्राम्य विकास राज्यमंत्री आनंद स्वरूप शुक्ला विकास कार्यों की समीक्षा करेंगे। इस दौरान वे बड़े भुगतान वाले ग्राम पंचायतों की जांच भी करेंगे।

दरअसल महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत प्रत्येक वित्तीय वर्ष में किसी भी ग्रामीण परिवार के उन वयस्क सदस्यों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराया जाता है जो प्रतिदिन 220 रुपये की सांविधिक न्यूनतम मजदूरी पर सार्वजनिक कार्य संबंधित अकुशल मजदूरी करने के लिए तैयार हैं। इस अधिनियम को ग्रामीण लोगों की क्रय शक्ति को बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। लेकिन वित्‍तीय अनियमितता सामने आने के बाद यह दूर की कौड़ी साबित हो रही है।

Posted By: Saurabh Chakravarty

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