बीएचयू में शुरू होगा कैडेवरिक ट्रांसप्लांट, ब्रेन डेड मरीजों के अंगों से बचेगी जान
काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) ने मृतदाता अंग प्रत्यारोपण की प्रक्रिया को सुगम और पारदर्शी बनाया है, जिससे पूर्वांचल के मरीजों ...और पढ़ें

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HighLights
बीएचयू ने मृतदाता अंग प्रत्यारोपण प्रक्रिया को सुगम बनाया।
पूर्वांचल के मरीजों को महंगे अस्पतालों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।
किडनी और कार्निया प्रत्यारोपण पहले चरण में शुरू होगा।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के चिकित्सा विज्ञान संस्थान (आइएमएस) ने मृतदाता अंग प्रत्यारोपण (कैडेवरिक आर्गन डोनेशन) की पूरी प्रक्रिया को अब और अधिक सुगम, पारदर्शी और गतिशील बना दिया है। सर सुंदरलाल अस्पताल और ट्रामा सेंटर में अंगों का समय पर प्रमाणीकरण संभव होने से पूर्वांचल के मरीजों को अब दिल्ली या मुंबई जैसे महानगरों के महंगे अस्पतालों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।
मानव अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम, 1994 और 2014 के नियमों के तहत किसी भी ब्रेन डेड व्यक्ति के अंगों को दान करने से पहले चिकित्सीय और कानूनी पुष्टि अनिवार्य होती है। इस प्रक्रिया को त्रुटिहीन और तेज बनाने के लिए निदेशक प्रो. एसएन संखवार ने नौ सदस्यीय उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया है।
विशेष समिति में विभिन्न विभागों के वरिष्ठ प्रोफेसरों और चिकित्सकों को शामिल किया गया है जो मरीज की स्थिति का सावधानीपूर्वक जांच कर प्रमाणीकरण करेंगे। दक्षिण भारत के सफल माडलों की तर्ज पर बीएचयू ने अब इस जीवनरक्षक चिकित्सा प्रणाली को मजबूती के साथ धरातल पर उतारने की तैयारी कर ली है।
इससे अंगदान को लेकर सामाजिक भ्रांतियां दूर होंगी। अनगिनत जिंदगियां बचाई जा सकेंगी। पहले चरण में किडनी और कार्निया (आंखों की पुतली) प्रत्यारोपण की सुविधा शुरू की जाएगी। इसके लिए यूरोलाजी और नेफ्रोलाजी टीमों को विशेष रूप से तैयार किया जा रहा है। चरणबद्ध तरीके से लिवर और हृदय जैसे जटिल अंगों के प्रत्यारोपण की दिशा में भी कदम बढ़ाए जाएंगे। निजी अस्पतालों की तुलना में सरकारी सेटअप में किडनी प्रत्यारोपण का खर्च मात्र डेढ़ से दो लाख रुपये के आसपास होने की उम्मीद है।
कमेटी के प्रमुख विशेषज्ञ सदस्य
प्रो. राजीव कुमार दुबे एनेस्थीसियोलाजी सर सुंदरलाल अस्पताल, प्रो. कविता मीणा एनेस्थीसियोलाजी ट्रामा सेंटर, प्रो. सुनील कुमार राव बाल चिकित्सा, प्रो. राहुल खन्ना जनरल सर्जरी, प्रो. अभिषेक पाठक न्यूरोलाजी, प्रो. मनस्वी चौबे जनरल मेडिसिन, प्रो. रवि शंकर प्रसाद, डा. नित्यानंद पांडेय एवं डा. शुभी दुबे न्यूरोसर्जरी विभाग।
40 से अधिक जीवनरक्षक मामले
एनेस्थीसियोलाजी विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर आरके दुबे बताते हैं कि अस्पताल के ट्रामा सेंटर और अन्य आइसीयू में लगभग 100 बेड की क्षमता है। लंबे समय से भर्ती गंभीर मरीजों में हर महीने तीन से चार मामले ऐसे सामने आते हैं जहां ब्रेन डेथ की स्थिति बनती है। स्वजनों की सहमति मिल जाए तो वर्ष भर में 40 से अधिक मामलों में अंगदान की प्रबल संभावना बन सकती है। स्वजन की काउंसलिंग के लिए डाक्टरों के साथ सोशल वर्कर और जरूरत पड़ने पर धार्मिक व प्रतिष्ठित लोगों की भी मदद ली जाएगी।
