बलिया [सुधीर तिवारी]। ददरी मेला का इतिहास काफी पुराना है। इस ऐतिहासिक मेला के मीना बाजार के बीचो-बीच स्थापित भारतेंदु कला मंच ददरी मेले की आन-बान-शान है। इस मंच पर संस्कृति, धर्म व मनोरंजन का बेजोड़ समागम होता है। मेले में आने वाली जनता इसका भरपूर आनंद उठाती है। इस भारतेंदु कला मंच का बड़ा ही गौरवशाली इतिहास भी है। इस मंच पर एक से बढ़कर एक विश्व स्तर के कलाकार, कवि व साहित्यकार शिरकत कर चुके है। 2018 में ही मशहूर गायिका अनुराधा पौडवाल व महान कवि कुमार विश्वास भी इस मंच की शोभा बढ़ा चुके है।

वैसे तो यह मंच बहुत प्राचीन व लब्ध है पर 1884 में इसे भारतेंदु हरिश्चंद्र के साथ जोड़ा गया और नामकरण हुआ भारतेंदु कला मंच। नगर पालिका द्वारा स्थापित इस मंच अपने गौरव के लिए विख्यात है। वर्ष 1884 में तीन नवंबर को महान कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र ने इस मंच पर अपने सहयोगियों के साथ नाटक नील गिरि व राजा हरिश्चंद्र की प्रस्तुति दी थी। संयोग था कि इस प्रस्तुति के मात्र दो महीने तीन दिन बाद छह जनवरी 1885 को उनका देहावसान हो गया। तभी से इस मंच का नामकरण महान कवि के नाम से जोड़ कर किया गया। भारतेंदु कला मंच न सिर्फ जनपद व प्रदेश बल्कि पूरे देश में अपनी एक विशिष्टता रखता है।

देश के नामचीन कवियों की कही बात को गौर करें तो वे कहते हैं कि जब तक कोई कवि इस मंच से काव्य-पाठ नहीं करता तब तक वह अखिल भारतीय हो ही नहीं सकता। भारतेंदु कला मंच अपने यश का सफर तय करते-करते आज बुलंदी के शिखर पर विद्यमान है। आज स्थिति यह है कि प्रत्येक वर्ष मेला के दौरान इस मंच पर धार्मिक आयोजन सहित संस्कृति व मनोरंजन का भव्य आयोजन होता है। साथ ही एक से बढ़कर एक कवि, साहित्कार व कलाकार आकर अपने को धन्य समझते हैं। नपा भी मंच के गरिमा के अनुरूप ही इस पर कार्यक्रमों को कराती है। हमेशा इस मंच की गरिमा का ख्याल रखा जाता है। यहां तक दंगल प्रतियोगिता का आयोजन इसी मंच पर होता है। इसमें भी नामी गिरामी पहलवान भाग लेते हैं। 

 

Posted By: Saurabh Chakravarty

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