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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 02, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

यूनेस्को के विश्व धरोहरों की सूची में वाराणसी के रामनगर की रामलीला की शुरुआत उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ से मानी गई

By Saurabh ChakravartyEdited By:
Published: Fri, 02 Sep 2022 08:38 PM (IST)

Ramlila of Ramnagar काशिराज के संरक्षण भक्त रूपी जनता और आयोजकों के समर्पण से शुरू की गई रामलीला धीरे - ...और पढ़ें

काशिराज के संरक्षण में शुरू की गई रामलीला धीरे-धीरे विश्वप्रसिद्धि के स्वर्णिम सोपान चढ़ती गई
काशिराज के संरक्षण में शुरू की गई रामलीला धीरे-धीरे विश्वप्रसिद्धि के स्वर्णिम सोपान चढ़ती गई

वाराणसी, डा. अवधेश दीक्षित । पौराणिक आख्यानों के अनुसार जब महर्षि वेदव्यास काशी में आतिथ्य की उपेक्षा से रुष्ट होकर गंगा के पूर्वी तट पर लोलार्क के आग्नेय कोण में स्थित तपोवन में नई काशी बनाने को उद्यत हुए तब शिवजी ने विनती कर उन्हें रोका तथा आदर के साथ काशीवास की अनुमति प्रदान की। तब से यह स्थान व्यासकाशी नाम से प्रतिष्ठित हुआ तथा कालांतर में रामनगर नाम से जाना गया। आजादी से पूर्व 200 वर्षों तक रामनगर काशी की राजधानी रही। काशिराज के संरक्षण, भक्त रूपी जनता और आयोजकों के समर्पण से शुरू की गई रामलीला धीरे - धीरे विश्वप्रसिद्धि के स्वर्णिम सोपान चढ़ती गई और आज यूनेस्को के विश्व धरोहरों की सूची में शामिल होने का भी गौरव प्राप्त कर चुकी है।

रामलीला और रामनगर इस तरह से एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं कि अक्सर ही लोग "रामलीला मंचन की वजह से इस नगर का नाम रामनगर पड़ा होगा " ऐसा मान लेते हैं। आश्चर्यजनक रूप से यह साम्य भवितव्यता का ईश्वरीय विधान ही प्रतीत होता है। यद्यपि कि इस रामलीला की शुरुआत को लेकर तमाम दंतकथाएं व किंवदंतियां विद्यमान हैं, तथापि निर्विवाद रूप से रामनगर की रामलीला काशिराज उदित नारायण सिंह के शासनकाल में प्रारम्भ हुई। महाराज उदित नारायण सिंह का शासन काल 1796 से 1835 ईस्वी तक था। इस तरह से रामलीला की शुरुआत उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ से मानी जा सकती है।

रामलीला के इतिहास व माहात्म्य के लोकप्रसार को दृष्टिगत रखते हुए महाराज विभूति नारायण सिंह ने अपने समय में राजाश्रय से कुछ तथ्यात्मक सामग्री पुस्तिका के रूप में " श्री रामलीला रामनगर " नाम से प्रकाशित कराई। इसके लेखक दुर्ग स्थित तत्कालीन प्रकाशन व संपादन विभाग के अधिकारी पं. ठाकुर प्रसाद द्विवेदी थे। इस पुस्तिका में भी इस बात का जिक्र है कि प्रारंभ के कुछ वर्षो तक रामलीला रामनगर किले के अंदर तथा मुख्य द्वार से थोड़ा आगे अयोध्या जी के मैदान में संपादित होती रही। वहीं दूसरी तरफ बनारस में पदस्थापित अंग्रेज़ अधिकारी जेम्स प्रिंसप ने 1825 में रामनगर की रामलीला से संबंधित एक चित्र बनाया जो कि उसकी पुस्तक - 'बनारस इलस्ट्रेटेड : इन द सीरीज आफ ड्राइंग' में प्रकाशित हुई। यह चित्र राम - रावण युद्ध के प्रसंग से संबंधित रणभूमि का है, जो कि वर्तमान लंका मैदान का है। इस चित्र को देखने से साफ होता है कि सन् 1825 में रामनगर की रामलीला अपनी भव्यता और विस्तार के शिखर तक पहुंच चुकी थी।

रामलीला के शुरुआत की कहानी का सच छोटा मिर्जापुर स्थित भोनू और बिट्ठल साव की रामलीला देखने में हुई देरी से उपजा हो अथवा राजकुमार की बिमारी का कारण हो यह कदापि उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितने कि इसकी विश्वप्रसिद्धि तथा अथाह श्रद्धा व समर्पण के कारण - तत्व हैं। महाराज उदित नारायण सिंह तथा इनके उत्तराधिकारी ईश्वरी प्रसाद नारायण सिंह दोनों ही धर्मपरायण तथा साहित्य - संस्कृति के अनुरागी थे। महाराज ईश्वरी नारायण सिंह के समय में रामलीला में प्रयुक्त संवादों, रामलीला स्थलों तथा मंचन को केंद्र में रखकर अद्वितीय ढंग से शोधन कार्य किया गया।

रामलीला के शोधक विद्वान संत काष्ठ जिह्वा स्वामी थे। विशुद्धानंद सरस्वती इन्हें अपना गुरु मानते थे। इनकी ख्याति से प्रभावित होकर ईश्वरी नारायण सिंह ने इनसे मिलकर इनको अपना गुरु बना लिया। रामलीला को व्यवस्थित कलेवर देने के लिए महाराज ईश्वरी नारायण सिंह ने हिंदी के उन्नायक बाबू भारतेंदु हरिश्चंद्र, रीवा नरेश रघुराज सिंह और संत काष्ठ जिह्वा स्वामी जी का महत्वपूर्ण सहयोग प्राप्त किया। रामलीला को सजीव रूप देने के लिए तीनों विद्वानों ने लीला स्थल ,संवाद और मंचन का वैज्ञानिक, व्यावहारिक व यथोक्त ढंग से निर्धारण व शोधन किया। इन तीनों महानुभावों के अतिरिक्त स्वामी महादेव आश्रम, गायघाट के स्वामी जी, तुलसी दत्त झा, पंडित मथुरानाथ, बाबू हरिहर सिंह, उमराव पंडित इत्यादि महानुभाव ने भी इस पुनीत कार्य में अपना महत्वपूर्ण योगदान अर्पित किया। काष्ठ जिह्वा स्वामी द्वारा रामलीला अभिनय के लिए तैयार की हुई हस्तलिखित पुस्तिका आज भी रामनगर दुर्ग में सुरक्षित है। इसकी प्रतिलिपि के सहारे वर्तमान व्यास - गण लीला का निर्देशन करते हैं ।

रामलीला का मंचन संत तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस के अनुसार अक्षरशः किया जाता है। रामायणी दल नारदी वाणी में प्रसंगानुसार सस्वर गायन करते हैं, तदुपरांत विहित भाग का मंचन संवाद अदायगी के साथ किया जाता है।

रामनगर की रामलीला का मंचन यथारूप विभिन्न शोधित स्थलों पर लगभग 10 वर्ग किलोमीटर की परिधि में किया जाता है। प्रसंगानुसार अयोध्या ,जनकपुर ,पंचवटी ,लंका चित्रकूट ,निषादराज आश्रम, अशोक वाटिका ,रामबाग, पंपासर इत्यादि सभी स्थल निर्धारित किए गए हैं।

लगभग दो सौ वर्षों से भी पूर्व रामलीला के निमित्त निर्धारित ये सभी स्थान शहरीकरण के वर्तमान दौर में भी पत्राचार का पता बनकर स्वतंत्र मोहल्लों के रूप में अपनी स्वर्णिम पहचान घोषित करते हैं।

यूं तो रामलीला मंचन की औपचारिक शुरुआत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी (अनंत चतुर्दशी ) से होती है, किंतु इस विश्व प्रसिद्ध रामलीला के महा अनुष्ठान के निमित्त पात्रों के चयन, प्रशिक्षण, रामलीला में प्रयुक्त औजारों - उपकरणों तथा मुखौटों व वस्त्रों इत्यादि की साज-सज्जा , प्रथम व द्वितीय गणेश पूजन आदि अनेक उपक्रमों के माध्यम से यह तैयारी महीनों पूर्व शुरू हो जाती है।

रामलीला स्थलों के अतिरिक्त रामलीला से संबंधित तिथियां एवं समय , रामलीला के व्यास एवं पात्रों की वंशानुगत परंपरा व समर्पण, रामलीला में रामायणी दल की महत्वपूर्ण भूमिका व निष्ठा, परंपरा व अनुशासन के अद्वितीय उदाहरण, रामलीला के साधु संत एवं नेमीजन, रामलीला का मंचीय पक्ष एवम् नेपथ्य इस महागाथा के बड़े अध्याय हैं। कहने को इतना कुछ है कि इसे एक निर्धारित लेख की सीमा में बांध पाना सर्वथा असंभव है।

संक्षेप में कहना चाहें तो , रामनगर की रामलीला की विश्व प्रसिद्धि के पीछे एक साथ तमाम कारक हैं। लगभग 10 वर्ग किलोमीटर के प्राकृतिक मंच पर प्रसंगानुसार चलायमान यह मंचन बहुत ही सहजता के साथ बिना ध्वनि विस्तारक यंत्रों के तथा बिजली के बड़े रोशनी करने वाले उपकरणों के स्थान पर पुराने समय के पंचलाइट और मशाल की रोशनी में प्रत्येक दिन न्यूनतम दस हजार की भीड़ को मात्र राम लीला व्यास के "चुप रहो! सावधान!" स्वर के द्वारा अनुशासित किया जाता है। यह रामलीला की विशिष्टता के कुछ सहज उदाहरण हैं। इसी प्रकार की सहजता इस रामलीला की श्रेष्ठता है और यह सौम्य श्रेष्ठता ही इसकी विश्वप्रसिद्धि का निर्विवाद कारण है।

रामनगर की रामलीला में प्रतिदिन आने वाले नेमी, साधु-संतों की समर्पित व अनुशासित टोलियां श्रद्धा और समर्पण के बड़े अध्याय हैं। यहां दर्शक मात्र दर्शक न होकर पात्रों और परिस्थितियों, मंचन व प्रसंग के अनुसार खुद भी रामलीला में भूमिका निभा रहा दिखाई देता है ।

पात्रों का पीढ़ी - दर- पीढ़ी समर्पण, नेमी - प्रेमी जनों का श्रद्धा और भक्ति भाव, रामलीला प्रसंगों का मौलिक मंचन, संवाद अदायगी, लीला मंचन में सूक्ष्म तत्वों का भी समावेश ; ऐसे अनेकानेक चित्र नए दर्शकों के लिए कौतूहल और नेमी जनों के लिए श्रद्धा के सागर हैं । एक माह तक चलने वाली इस अद्भुत रामलीला में न केवल मंच पर ही अपितु नेपथ्य में भी मजबूत भूमिका अदा करने वाले ऐसे तमाम चरित्र हैं जो कई पीढ़ियों से पूरी निष्ठा के साथ संलग्न हैं।

रामनगर की सुप्रसिद्ध रामलीला में प्रत्यक्ष - परोक्ष रूप से पूर्ण समर्पण व असीम आस्था के साथ अपनी बहुविध भूमिका निभाने वाले इन लोगों के लिए प्रशंसा, प्रसिद्धि और पारिश्रमिक अर्थहीन वस्तु है। कुल मिलाकर आप जिधर भी नजर डालेंगे रामलीला का प्रत्येक पक्ष अद्भुत, अद्वितीय, अतुलनीय और अनुपम है।

इस रामलीला की भव्यता ,दिव्यता और रम्यता अवर्णनीय है। मर्यादा पुरुषोत्तम की यह लीला अभिव्यक्ति से परे, अनुभूति की विषय वस्तु है। रामचरित के लीला की इस पावन भावभूमि तक पहुंचने के लिए शब्दों के जाल को दूर रखकर की गई साधना ही अभीष्ट प्राप्ति का मार्ग है। अस्तु, आइए ! अनंत चतुर्दशी से प्रारम्भ हो रही इस विश्वप्रसिद्ध रामलीला के साक्षी बनें।

- स्वतंत्र लेखक व विचारक