जागरण संवाददाता, वाराणसी। जैतपुरा की नक्कटैया में इस बार 26 अक्टूबर को कोविड से जंग नजर आएगी। लाग विमान इसी थीम पर होंगे तो जागरुकता प्रसार का जतन भी किया जाएगा। हर झांकी दो गज की दूरी मास्क है जरूरी जैसे संदेश देगी। कोविड गया नहीं है, आगाह करेगी। कोविड दिशा निर्देशों का पालन करने, डरने नहीं, हंसते-मुस्कुराते हुए डट कर लड़ने का संदेश देगी। यही नहीं देश स्वतंत्र होने के ठीक अगले साल 1948 में शुरू हुई नक्कटैया लीला में आजादी आजादी का अमृत महोत्सव भी मनाया जाएगा।

श्री आदर्श प्राचीन रामलीला समिति के अध्यक्ष रामेश्वर प्रसाद गुप्ता मम्मू ने सोमवार को नाटीइमली में आयोजित प्रेसवार्ता में बताया कि कोरोना के कारण एक साल के अंतराल पर हो रही नक्कटैया में 75 लाग विमान निकाले जाएंगे। साथ की मां काली के 51 स्वरूपों की कलाबाजी खास होगी। रात लगभग 11 बजे पिपलानी कटरा से नक्कटैया का जूलूस निकलेगा जो कबीरचौरा, लोहटिया, डीएवी कालेज, औसानगंज, जैतपुरा होते हुए छोहरा पर समाप्त होगा। उन्होंने बताया कि जैतपुरा की रामलीला सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल है। संरक्षक मंडल में शामिल तीन मुस्लिम बंधु भी कंधे से कंधा मिला कर समस्त आयोजन में संयोजक की भूमिका में होते हैं।

इसके अलावा रामलीला के तहत 19 अक्टूबर की शाम छह बजे श्रीराम बरात निकाली जाएगी जो छहमुहानी ख्वाजापुरा स्थित शम्भो माता मंदिर से उठेगी। बड़ी बाज़ार, नागकुंआ, जैतपुरा, औसानगंज, डीएवी कालेज होते हुए बरात दारानगर चौराहे पर समाप्त होगी। यहां प्रभुश्रीराम समेत चारो भाइयों के विवाह की लीला का मंचन किया जाएगा। प्रेसवार्ता में समिति के महामंत्री रविशंकर मिश्रा, प्रियांशु गुप्ता, कोषाध्यक्ष सुभाष पासी, सार्थक जायसवाल, विनीत जायसवाल आदि थे।

धनाभाव में सिर्फ प्रतीकात्मक होगी चेतगंज की नक्कटैया

स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में अंग्रेजों के पसीने छुड़ाने वाली चेतगंज की नक्कटैया इस बार प्रतीकात्मक होगी। चेतगंज लीला स्थल पर प्रभु का रथ लगेगा और नक्कटैया की लीला का मंचन किया जाएगा। ढोल-मंजीरा बजेगा और चौराहे के आसपास कुछ दूर तक सजावट भी की जाएगी। दरअसल, चेतगंज की नक्कटैया ऐसे दौर में अभिव्यक्ति का धारदार हथियार बनी जब देश परतंत्रता की बेडिय़ों में जकड़ा हुआ था। ऐसे समय में एक ऐसा पैगामी उत्सव जो राष्ट्रधर्म से जुड़ा और जिसका मर्म आजादी की अलख जगाना था। वर्ष 1857 की क्रांंति असफल होने के बाद अंग्रेजों का जुल्म बढ़ता जा रहा था।

ठीक तीन दशक बाद 1888 में बाबा फतेहराम ने नक्कटैया के जरिए अभिव्यक्ति को धार दी। धार्मिक उत्सव का चोला पहनाया और श्रव्य-दृश्य माध्यम से आजादी का पैगाम दे डाला। रामलीला के प्रसंगों के सहारे युवाओं के जत्थे आजादी के तराने गाते और छंदों चौपाइयों में सारी बातें कह जाते। जनसहयोग से इसका आयोजन किया जाता रहा। अध्यक्ष बच्चू साव व वरिष्ठ उपाध्यक्ष राजू यादव कहते हैं कि अब न तो दान देने वाले रहे और न चंदा। एेसे में नक्कटैया की औपचारिकता निभाई जा रही है। इसके लिए शासन-प्रशासन को लिखा जा चुका है, लेकिन मदद की कोई पहल नहीं की गई। एेसे में लक्खा मेला में शुमार करवा चौथ पर होने वाली चेतगंज की नक्कटैया इस बार धनाभाव में प्रतीकात्मक होगी।

Edited By: Saurabh Chakravarty