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‘का गुरू, कइसन हउवा’ से महात्मा बुद्ध, तीर्थंकर और गुरुओं तक, काशी ने सबको अपने भीतर जगह दी

By Prakash PandeyEdited By: Abhishek sharma
Published: Mon, 21 Sep 2026 01:14 PM (IST)

काशी का 'बनारसीपन' विभिन्न धर्मों और समुदायों को सहजता से अपनाता है, जो विश्व शांति दिवस पर एक जीवंत संदेश ...और पढ़ें

काशी का बनारसीपन: विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों का शांतिपूर्ण संगम।

काशी का बनारसीपन: विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों का शांतिपूर्ण संगम।

HighLights

  1. काशी का 'बनारसीपन' परिचय का मोहताज नहीं, सबको सहजता से अपनाता है।

  2. महात्मा बुद्ध, जैन तीर्थंकरों, सिख गुरुओं को काशी ने अपने भीतर समेटा।

  3. विभिन्न आस्थाओं के बावजूद शहर साझा, शांति और सह-अस्तित्व का प्रतीक।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। "सोयेंगे तेरी गोद में एक दिन मरके, हम दम भी जो तोड़ेंगे तेरा दम भर के, हमने तो नमाजें भी पढ़ी हैं अक्सर, गंगा तेरे पानी से वजू कर करके।" नजीर बनारसी की यह पंक्‍त‍ियां बनारसी म‍िजाज और समरसता की कहानी कहती है। 

गलियों के इस शहर में कहीं भी निकल जाइए। किसी चाय की दुकान पर बैठकर चाय की चुस्की ले ही रहे होंगे कि सामने से आवाज आएगी ‘का गुरू, कइसन हउवा?’ आप हक्का-बक्का होकर सोचेंगे कि सामने वाला कौन है? क्या आप उसे जानते हैं? फिर याद आएगा कि आप बनारस में हैं। यहां संबोधन परिचय का मोहताज नहीं रहता।

यह ऐसा शहर है, जहां कोई भी किसी से उसका हाल पूछ लेता है। हाल पूछने के लिए यह जानना जरूरी नहीं समझता कि सामने वाले का नाम, धर्म, मजहब या पहचान क्या है। यहां हर कोई बनारसी है और यही साझा पहचान इस शहर को थामे हुए है। विश्व शांति दिवस पर जब दुनिया शांति के लिए संवाद और साथ रहने की बात करती है, तब बनारस का यह सहज बनारसीपन अपने आप में शांति का एक जीवंत संदेश लगता है।

शांत बनारस ने थाम रखी है कई धर्मों की डोर

यह आदत आज की नहीं है। बनारस की फितरत रही है लोगों को अपने भीतर समा लेने की। किसी को अपना बनाने के लिए काशी ने उसे बदलने की कोशिश नहीं की, बल्कि शांति से अपने भीतर उसके लिए एक कोना बनाती गई। शहर का भूगोल बदला, बस्तियां बदलीं, नई परंपराएं जुड़ीं, मगर दूसरे के लिए जगह बनाने की यह तासीर बनी रही। महात्मा बुद्ध काशी की धरती पर आए तो सारनाथ उनकी स्मृति का हिस्सा बना।

जैन परंपरा में काशी चार तीर्थंकरों-सुपार्श्वनाथ, चंद्रप्रभु, श्रेयांसनाथ और पार्श्वनाथ-की जन्मभूमि से जुड़ी। गुरु नानक समेत सिख गुरुओं की यात्राओं ने इस शहर की धार्मिक स्मृति में एक और रंग जोड़ा। बाद में मुस्लिम बुनकर, कारीगर और कलाकार यहां आए तो बनारस ने उनके हुनर को अपनाया। बुनकरी, शिल्प और संगीत ने मिलकर शहर को नया रंग दिया। ईसाई समुदाय और संस्थाएं आईं तो शिक्षा, चिकित्सा और स्थापत्य की नई परत जुड़ी। आस्थाएं अलग रहीं, लेकिन शहर साझा होता गया।

आस्था की जड़ें पुरानी, इमारतें कई दौर की

  • जैन - चार तीर्थंकरों की जन्मभूमि परंपरा, वर्तमान जैन मंदिरों की इमारतें मुख्यतः 19वीं सदी की हैं।
  • बौद्ध - सारनाथ में महात्मा बुद्ध की स्मृति; परंपरा छठी शताब्दी ईसा पूर्व तक जाती है।
  • सिख - गुरु नानक की काशी यात्रा 16वीं सदी की स्मृति से जुड़ी है।
  • मुस्लिम - बीबी रजिया मस्जिद 13वीं सदी की परत से जुड़ी है।
  • ईसाई - औपनिवेशिक दौर में संस्थागत उपस्थिति; सेंट मेरी चर्च की नींव 1810 और निर्माण 1812 में पूरा हुआ।

शांति एकरूपता से नहीं, साथ रहने की क्षमता से बनती है

घाट पर सूरज की किरणें किसी से उसकी पहचान नहीं पूछतीं। किसी की कलाई पर कलावा है, कोई टोपी पहने है, किसी के सिर पर पगड़ी और किसी के गले में क्रास। आस्था अपनी-अपनी है, मगर शहर साझा है। शायद यही बनारस का अपना शांति संदेश है और यही बनारसीपन की वह डोर है, जो इतने अलग रंगों को एक साथ थामे हुए है।