जागरण संवाददाता, वाराणसी। कैंट स्टेशन से चलकर गिरजाघर बेरीकेडिंग पर ठहर गए वाहनों से नीचे पैर धरने वाला हर चौथा सैलानी होटल या लाज का पता पूछने से पहले भैरव सरदार के चायखाने का ठिकाना पूछता है। चौराहे से महज 50 कदम आगे चच्चा की दुकान पर तुलसी-अदरख की चाय का कुल्हड़ गटकने के बाद ही आगे की कुछ सोचता है। कई साल से भी अधिक समय से मशहूरी का डंका बजा रही भैरव चच्चा की यह 'पेशल' चाय बनारस वालों के लिए तो दिनचर्या का अभिन्न अंग है।

सुबह-ए-बनारस का हुस्न हो या शाम-ए-बनारस का शबाब, हर खांचे में इस कड़क चाय का अपना अलग ही रंग है। बाकी के शहरों की तरह अपने बनारस में भी गरम चाय की चुस्की सुबह की पहली जरूरत के रूप में स्थापित हो चुकी है। फर्क सिर्फ इतना कि अन्य नगरों के मुकाबले काशी में हर सौ कदम पर चाय के घूंट की लज्जत बदल जाती है। लीकर भले ही एक जैसा हो, दूध-चीनी, अदरख-तुलसी, नीबू-पुदीना, अजवाइन और सोंठ आदि के योग-संयोग के करामात के चलते यहां की चाय के जायके के साथ इनकी तासीर भी अलहदा रंग लाती है।

19वीं सदी की शुरुआत से भी दो-चार साल पहले भैरव चच्चा के पिता और हंसोड़ बनारसी के नाम से लोकप्रिय भगानू सरदार ने जाड़े के दिनों में इम्युनिटी बूस्टर के रूप में चाय के साथ तुलसी के अनुपान का प्रयोग आजमाया। पहले ही घूंट में लोग इसके स्वाद के मुरीद हो गए। यह औषधीय पेय अलसाई काया को स्फूर्ति देने का टानिक बन गया। एक ऐसा भी वक्त आया, भैरव सरदार बताते हैं कि वह अपनी चाय में हमेशा श्यामा तुलसी (स्याह और अपेक्षाकृत तीखी) का उपयोग करते हैं।

तुलसी और अदरख का अर्क खूब खिलकर चाय में खुद अपना परिचय दे, इसलिए अदरख, तुलसी की पत्तियों और उसके फूल की भी कसकर कुटाई का जतन करते हैं। चच्चा के बेटे नीरज बताते हैं कि अलबेली चाय का जलवा ऐसा कि पीने वाले दस-दस किलोमीटर की दूरी तय कर यहां अड़ी जमाते हैं। अकेले नहीं, दस-बीस की टोलियों में कतार लगाकर चाय के कुल्हड़ लड़ाते हैं।

Edited By: Saurabh Chakravarty