बलिया [सुधीर तिवारी] पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने वर्ष २००९ में चंद्रशेखर पर लिखे अपने एक लेख में यह भी स्पष्ट किया है कि इस देश ने चंद्रशेखर को भले ही अल्प समय के लिए प्रधानमंत्री बनाया हो, किंतु इतने कम समय में ही उन्होंने बाबरी मस्जिद का मामला सुलझाने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाया था। एक ऐसा हल निकालने का प्रयास किया था जिसमें बाबरी विवाद से जुड़े दानों पक्षों की सहमति थी। अगर यह प्रयोग सफल हो गया होता तो देश के लिए यह ऐतिहासिक बात होती लेकिन कुछ लोग नहीं चाहते थे कि यह मामला सुलझे और चंद्रशेखर सरकार को ही गिराने का षडय़ंत्र कर दिए। चंद्रशेखर चाहते तो अपने सिद्धांतों से समझौता कर कुछ महीने और पीएम रह सकते थे लेकिन यह उनके स्वभाव ओर सिद्धांत दोनों के खिलाफ था, लिहाजा उन्होंने अपने सरकार की ही तिलांजलि दे दी। यह सत्य है चंद्रशेखर की ङ्क्षजदगी का एक हिस्सा मिशन व सत्ता पक्ष से लड़ते हुए बीता। जब संवेदना भी बाजार में बिकने लगे तो उस संवेदना को विवेक के साथ जोडऩे वाला शख्स अक्सर हाशिए पर छोड़ दिया जाता है। चंद्रशेखर एक काल में इसी त्रासदी से लड़ते रहे।

गठबंधन राजनीति के प्रणेता भी माने जाते हैं चंद्रशेखर : देश की लोकतांत्रिक प्रणाली और संसदीय राजनीति में अटूट श्रद्धा रखने वाले चंद्रशेखर को राष्ट्र हमेशा याद रखेगा। उन्होंने देश की सेवा करते हुए दो बातों से कभी समझौता नहीं किया। पहला वे आजीवन समाजवाद और समाजवादी व्यवस्था के पक्षधर रहे। कांग्रेस जैसे राजनीतिक दल के अभिन्न अंग रहते हुए भी उन्होंने अपने युवा साथियों के माध्यम से समाजवादी दिशा में ले जाने का प्रयास किया। जब उन्हें लगा कि कांग्रेस को कुछ निरंकुश ताकतें अपने हिसाब से चलाना चहती हैं तो, वे बिना वक्त गंवाए देश को उबारने के लिहाज से जयप्रकाश नारायण के साथ आकर खड़े हो गए। इसकी कीमत उन्हें जेल में नजरबंदी के रूप में चुकानी पड़ी। इसके बावजूद भी वे झुके नहीं बल्कि इससे समाजवाद के प्रति उनकी धारणा और बढ़ गई। इसी का परिणाम था कि देश में जनता पार्टी के आंदोलन ने जोर पकड़ा और कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी। भले ही यह प्रयोग ज्यादा दिनों तक नहीं चल सका ङ्क्षकतु जिले के पुराने लोग मानते हैं कि देश में वास्तविक अर्थों में गठबंधन के राजनीति की शुरुआत यहीं से हुई थी और इसके प्रणेता चंद्रशेखर माने जाते हैं।

गठबंधन की व्यवस्था पर यह थी चंद्रशेखर की सोच : गठबंधन की व्यवस्था पर चंद्रशेखर का मानना था कि गठबंधन एक व्यवस्था मात्र है। यह लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुकूल नहीं है। चाहे वह भारत की बात हो या दुनिया के किसी अन्य देश की। जनतंत्र में होता यह है कि यदि कोई पार्टी बहुमत में नहीं आती है तो एक समझौते को तैयार हो जाती है लेकिन इसके लिए कुछ चीजों का होना आवश्यक है। पहली बात यह कि देश के सामने जो समस्याएं हैं उनपर एक मत हो। दूसरी बात यह कि सिद्धांतों के लिए क्या कार्यक्रम अपनाया जाए कि आपसी सहमति बनी रहे। अगर यह नहीं है तो वह प्रजातांत्रिक गठबंधन नहीं है। केवल सत्ता में भागीदारी है।

कन्याकुमारी से दिल्ली तक की पदयात्रा : १९८३ में चंद्रशेखर ने कन्याकुमारी से दिल्ली तक की पदयात्रा की थी। गांधी की तरह अपने पैरों से हिंदुस्तान को नापकर किसी ने मानस को परखा तो वे चंद्रशेखर थे। उस पदयात्री की राजनीति में ना धर्म था, ना जाति थी। बस पांच बुनियादी मुद्दे थे-सबको पीने का पानी, हर व्यक्ति को कुपोषण से मुक्ति, हर बच्चे को पढ़ाई का हक, हर इंसान को स्वास्थ्य का अधिकार और मनुष्य मात्र की गरिमा की रक्षा, जिसे सामाजिक समरसता का नाम दिया। भारतीय राजनीति में चंद्रशेखर वह नाम है जो हमेशा धारा के विपरीत ही चलते रहे।

Posted By: Abhishek Sharma