वाराणसी [प्रमोद यादव]। काशी की अनोखी परंपराओं में बाबा काशी विश्‍वनाथ को लगने वाला भोग ही नहीं बल्कि काशी में बाबा विश्‍वनाथ को बनारसी पान भी खूब पसंद है। हर फक्कड़ मस्त बनारसी की तरह बाबा विश्वनाथ भी मघई पान के मायापाश से बरी नहीं हैैं। हर रोज मुंह अंधेरे मघई पान घुलाने के बाद ही दरबार की शुरुआत करते हैैं। मजे की बात यह कि लौंग- इलायची से सुवासित यह बीड़ा 150 वर्षों से एक ही दुकान से आ रहा है। भुल्लन चा (बैजनाथ पटेल) का परिवार इसे अपना सौभाग्य मानता है कि चार पीढिय़ों से काशीपुराधिपतिकी कृपा से उन्हें यह अवसर निरंतर मिलता रहा है। बनारसी पान को लेकर 'खइके पान बनारस वाला' के बोल फ‍िल्‍मों में यों ही नहीं सुपरहिट हुए हैं।  

आमतौर पर दुकानों-प्रतिष्ठानों में सुबह की बोहनी करने से पहले पहला पान-या खानपान का सामान आराध्य देवों को समर्पित किया जाता है। इससे इतर भुल्लन चा की कोतवालपुरा स्थित दुकान में ग्राहकों को निबटाने के बाद रात में ही एक बार फिर सफाई-मजाई शुरू हो जाती है। दुकान बढ़ाने (शटर गिराने) से पहले ही बरकदार पान का सिंघाड़ा (गिलौरी) गढऩे का क्रम शुरू हो जाता है। मगही पान पर शुद्ध कत्थे का लेप, सुपाड़ी व छोटी इलायची सजाकर लौंग से पैक किया जाता है। शयन आरती से पहले ही भोर में की जाने वाली मंगला आरती में अर्पित करने के लिए मंदिर पहुंचा दिया जाता है। परंपरा को सिर माथे लगाए पटेल परिवार श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर में पांच तो उनके आंगन में विराजमान माता अन्नपूर्णा के लिए दो, ढूंढिराज गणेश को एक माता शीतला मंदिर में पांच पान का दोना समर्पित कर आता है। यह बाद में प्रसाद स्वरूप भक्तों को भेंट कर दिया जाता है। यह बात अलग है कि कौन श्रद्धालु भोले की इस विशिष्ट बीड़े के कृपा प्रसाद का सौभाग्य पाता है। 

भुल्लन चा परंपरा का जिक्र करते भावुक हो जाते हैैं। बताते हैैं-देश आजाद होने से पहले उनके पिता स्व. जग्गू पटेल ने उन्हें बाबा समेत अन्य देवालयों में पान पहुंचाने की परंपरा से अवगत कराया था। लगभग 150 वर्षों की परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा से निभाई जा रही है। श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर में सुरक्षा घेरा न कसने से पहले खोमचे के आकार की उनकी दुकान सुबह छह बजे खुलती तो अगले दिन भोर में बाबा की मंगला आरती में पान देने के बाद बंद होती थी। फिलहाल बंदिशों के कारण इसका समय सुबह सात से रात 12 बजे तक करना पड़ा। बनारस के विशेष पर्वों यथा महाशिवरात्रि, रंगभरी एकादशी व अन्नकूट पर परंपरागत तरीके से काशी के दो दर्जन देवालयों में पान समर्पित किया जाता है। 

Posted By: Abhishek Sharma

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