आधुनिकता से कोसों दूर इस रामलीला को इलेक्ट्रिक लाइटों की चकाचौंध छू भी नहीं सकी, किरदार की बुलंद आवाज से माइक की जरूरत भी नहीं
रामनगर की यूनेस्को-मान्यता प्राप्त 200 साल पुरानी रामलीला में जनकपुर से बारात अयोध्या लौटी, जहाँ माताओं ने चारों पुत्रों और ...और पढ़ें
HighLights
रामनगर रामलीला यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त 200 साल पुरानी परंपरा।
जनकपुर से बारात अयोध्या लौटी, चारों बहुओं का परछावन हुआ।
बिना आधुनिक उपकरणों के, खुले आसमान में होती है यह लीला।
जागरण संवाददाता, वाराणसी (रामनगर)। 'रामनगर की रामलीला' यही नाम दर्ज है यूनेस्को के दस्तावेजों में, इस अनोखी रामलीला के बारे में बनारसी तो जानते ही नही जीते भी हैं। माह भर चलने वाली अनवरत रामलीला ने कोरोना में भी अपना मंच जागृत रखा। मनौती मनुहारों और मुरादों से जुड़ी रामनगर की रामलीला दो सौ साल पुरानी मानी जाती है। काशी नरेश की परंपराओं के क्रम में शुरू हुई रामलीला जैसे आयोजन के पहली कड़ी में थी वही कड़ियां आज भी जुड़ी हैं।
सदियां बदलीं और आधुनिकता के तेवर कलेवर से जगमग और लेजर लाइटों के साथ लाउड स्पीकर और बेस के आवाज नहीं यहां गूंजती है रामलीला के किरदारों के गले से निकले वाक्य जो रामचरित मानस के पाठ से समृद्ध होती है। काशी नरेश का आशीर्वाद था तो रामनगर की रामलीला को क्या नहीं मिल सकता था? लेकिन आज भी मंच नहीं खुले आसमान के नीचे रामलीला होती है। रामनगर के ही अलग अलग मोहल्लों के नाम लंका है तो कहीं अयोध्या।
जैसे जैसे रामचरित मानस के कांड के पाठ आगे बढ़ते हैं वैसे ही वैसे मोहल्लों में घुमंतू रामलीला का एक एक दिन आयोजन होता है। अनंत चतुर्दशी को रावण जन्म के साथ शुरू रामलीला अब सप्ताह भर से अधिक पूरी हो चुकी है। इसी कड़ी में गुरुवार की राम जनकपुर का प्रसंग सुन दर्शक आस्था से सराबोर हो उठे।
जनकपुर में कल खुशी का माहौल था और आज अयोध्या ने सारे जहां की खुशियों को अपने दामन में समेट लिया। ऐसा होना स्वाभाविक था, क्योंकि एक साथ चार-चार सुकुमारी दुल्हनें घर के आंगन में आईं। माता कौशल्या अभिभूत थीं, जबकि कैकई और सुमित्रा भी पुत्रवधुओं को पाकर निहाल थीं। बारात लौटने पर आरती उतारने के लिए द्वार तक पहुंच गईं।
जनकपुर से बारात वापस आ रही थी, वहीं साधु संत, युवा और अन्य लोग इस बारात का हिस्सा बन रहे थे। नगर में जगह-जगह महिलाएं पुत्रवधुओं पर पुष्प वर्षा कर रही थीं। चारों भाई घोड़े पर सवार थे, जबकि पुत्रवधुएं पालकी में बैठकर जनकपुर से अयोध्या आ रही थीं।
अयोध्या पहुंचने पर माता कौशल्या, सुमित्रा और कैकई अयोध्या के दरवाजे पर आ गईं। तीनों माताओं द्वारा चारों पुत्रों और पुत्रवधुओं का परछावन किया गया। यह दृश्य लीलाप्रेमियों को अभिभूत कर गया। चारों पुत्रवधुओं का परछावन देखने के लिए रामनगर और आसपास के गांवों से हजारों महिलाएं आईं।
महिलाओं के बीच यह मान्यता है कि चारों भाइयों और पुत्रवधुओं को एक साथ देखकर संयुक्त परिवार की परिकल्पना बनती है, जिससे परिवार में सुख-समृद्धि आती है और आपसी मनमुटाव भी कम होते हैं। इस प्रकार की धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों से न केवल सामाजिक एकता बढ़ती है, बल्कि यह परंपराओं को भी जीवित रखती है।
इस अवसर पर अयोध्या का वातावरण भक्तिमय और उल्लास से भरा हुआ था। लोग एक-दूसरे को बधाई दे रहे थे और इस पावन अवसर का आनंद ले रहे थे। रामलीला का यह आयोजन न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि यह सामाजिक समरसता का भी प्रतीक है।
इस प्रकार की रामलीला में भाग लेना और इसे देखना लोगों के लिए एक विशेष अनुभव होता है। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था को प्रकट करता है, बल्कि यह सांस्कृतिक धरोहर को भी संजोए रखता है।
