वाराणसी। अमेरिका के शिकागो शहर में आज से 125 वर्ष पहले आयोजित विश्व धर्म महासभा में स्वामी विवेकानंद की ओर से दिए गए व्याख्यान की जयंती पर श्रीरामकृष्ण मिशन सेवाश्रम की ओर से 17 दिवसीय उत्सवी श्रृंखला का मंगलवार को आगाज हुआ। लक्सा स्थित परिसर में आयोजित समारोह का प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के अध्यक्ष पद्मश्री प्रो. विवेक देबरॉय ने उद्घाटन किया।

'स्वामी जी के सपनों का आधुनिक मानव' विषयक गोष्ठी को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित करते हुए उन्होंने कर्म की प्रधानता पर बल दिया। कहा कि स्वामी विवेकानंद का सदा इस पर ही जोर रहा। आज हम हर बात में यह कहने के अभ्यस्त हो गए हैं कि सरकार यह नहीं करती, सरकार वह नहीं करती, लेकिन कुछ ही वर्ष पहले हम ऐसे नहीं थे। हम खुद के साथ समुदाय के कर्तव्य को लेकर सजग थे। स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा पर भी जो बातें कहीं, वह किसी सरकारके लिए नहीं, बल्कि हमारी, आपकी, समुदाय की शिक्षा के प्रति जिम्मेदारी और कर्तव्य के बारे में कही। स्वामी जी जब वर्तमान भारत की बात करते हैं तो वह गीता के श्लोक से स्वदेश का मंत्र देते हैं। जिसका सार है कि- मेरी कापुरुषता, मेरी दुर्बलता दूर करो। 

अध्यक्षता करते हुए रामकृष्ण अद्वैत आश्रम के अध्यक्ष स्वामी विश्वात्मानंद ने कहा कि आज विज्ञान के विकास से पूरा विश्व एक दूसरे के समीप आ गया है। यह भारत की ही 'वसुधैव कुटुंबकम्' की सोच व देन है। वास्तव में हिंदू धर्म का आधार है कि हर आत्मा, विश्वात्मा का ही एक अंश है। यह भारत का अन्वेषण नहीं, बल्कि आश्चर्यजनक भारतीय अनुभूति है। हम जब यह समझ जाते हैं तो मैं-तुम, मेरा देश-तेरा देश का अस्तित्व रहते हुए भी भेद मिट जाता है। विभिन्न धर्मों के प्रवर्तक ईश्वर की किताब का एक अध्याय मात्र हैं। ईश्वर की किताब का अभी पूर्ण होना बाकी है। हम सभी उस विकास के लिए भी तैयार हैं।

प्रेमी व एकता केभाव वाला मनुष्य ही स्वामीजी के स्वप्न का आधुनिक मनुष्य है। बतौर विशिष्ट अतिथि काशी विद्यापीठ के कुलपति प्रो. टीएन सिंह व मिशनरी सिस्टर्स ऑफ द क्वीन ऑफ द अपोस्टल्स सिस्टर इमेल्डा ने भी विचार व्यक्त किए। स्वामी ईष्ट देवानंद ने भजन प्रस्तुत किए। स्वागत स्वामी डा. वरिष्ठानंद, संचालन डा. अभिषेक सिंह व धन्यवाद ज्ञापन देवाशीष दास ने किया। 

Posted By: Abhishek Sharma