वाराणसी, जेएनएन। एक तरफ जहां प्राथमिक विद्यालय की स्थिति व व्यवस्था को लेकर समय-समय पर अंगुली उठाई जाती है, वही पिंडरा ब्लॉक के सैरा गोपालपुर का प्राथमिक विद्यालय संभवत सूबे का पहला परिषदीय विद्यालय है, जहां टेस्ट लेकर बच्चों का दाखिला लिया जाता है। इस विद्यालय में दाखिले के लिए अभिभावक बीएसए तक की पैरवी लगवाते हैं। इसके बावजूद हर साल कई बच्चों को विद्यालय की चौखट से निराश होकर लौट जाना पड़ता है। इस विद्यालय में पिंडरा ही नहीं बड़ागांव, बाबतपुर सहित अन्य क्षेत्रों से बच्चे पढ़ने आते हैं।

आपके मन में यह सवाल उठ रहा होगा कि आखिर इस विद्यालय की क्या है खासियत। दरअसल अन्य परिषदीय विद्यालयों की भांति यह स्कूल भी है। बस अन्य सरकारी विद्यालयों से इसमें पठन-पाठन का बेहतर माहौल है। साथ ही निजी विद्यालयों की भांति संसाधन। यही कारण है कि यह विद्यालय कान्वेंट स्कूलों को टक्कर दे रहा है। यहां के बच्चों को फर्राटेदार अंग्रेजी में अभिवादन करते और उनके रहन-सहन देख कोई भी मात खा सकता है। यही नहीं कॉन्वेंट की तर्ज पर डायरी, टाई व बेल्ट की व्यवस्था उन्हें लकदक कर देती है। आकर्षक विद्यालय परिसर हर लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यही कारण है कि राज्य स्तर पर 100 उत्कृष्ट परिषदीय विद्यालयों की सूची में जनपद से एक मात्र सैरा गोपालपुर भी शामिल है।

यही नहीं नेपाल से शैक्षिक भ्रमण पर आए सदस्यों ने भी इस विद्यालय की जमकर तारीफ की थी। टीम ने नेपाल में भी इसी तरह की शिक्षण व्यवस्था विकसित करने की बात कही थी। इस प्रकार इस विद्यालय की गूंज नेपाल तक पहुंच चुकी है। क्लास ही नहीं, बच्चे भी स्मार्ट ¨हदी माध्यम का विद्यालय होने के बावजूद यहां अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई होती है। निजी स्कूलों की भांति इस स्कूल के स्मार्ट क्लास, डेस्क-बेंच, बिजली, इन्वर्टर कंप्यूटर, प्रोजेक्टर, सोलर पंप, आरओ, रूम टू-रीड (लाइब्रेरी) सहित अन्य सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसके अलावा बच्चों को खेलने के लिए पर्याप्त मैदान भी है। बालीबाल, बैडमिंटन, कैरम, लूडो, सहित विभिन्न खेलों की भी सामग्री मौजूद है। खास बात यह कि निजी स्कूलों की भांति बच्चे यूनिफार्म के साथ आई-कार्ड टाई-बेल्ट में नजर आते हैं। शनिवार के लिए अलग से लोवर व टी-शर्ट निर्धारित है। विद्यालय की ओर से हर बच्चों को डायरी दी जाती है।

अध्यापक इसमें साप्ताहिक टेस्ट व बच्चों की गतिविधियां दर्ज करते रहते हैं ताकि बच्चों की गतिविधियों की जानकारी अभिभावकों को भी मिलती रहे। खास बात यह कि इन सुविधाओं के लिए विद्यालय को कोई अनुदान नहीं मिला है। विद्यालय के हेडमास्टर व सहायक अध्यापकों ने स्वयं के प्रयास से विद्यालय को सजाने-संवारने का कार्य किया है। हेडमास्टर का प्रयास सराहनीय पहले इस विद्यालय की स्थिति काफी खराब थी। विद्यालय में महज 130 बच्चे नामांकित थे। वर्ष 2016 में विद्यालय के हेडमास्टर मनोज सिंह बने। इसके बाद विद्यालय की स्थिति बदलती चली गई। वर्तमान में करीब 250 पंजीकृत बच्चों को पढ़ाने के लिए नौ शिक्षक नियुक्त हैं।

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